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Nainital News: धूप बनती है फ्रिज और हवा करती है संरक्षण
Mon, 02 Nov 2026 01:22 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Mon, 02 Nov 2026 01:22 AM IST
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हल्द्वानी। आधुनिक दौर में जहां खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज का इस्तेमाल आम है, वहीं हिमालय की दुर्गम जोहार घाटी का शौका (भोटिया) समुदाय आज भी प्रकृति के सहारे मांस संरक्षण की दशकों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। यहां धूप फ्रिज का काम करती है और पहाड़ों की शुष्क हवा मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करती है। एमबी इंटर कॉलेज मैदान में आयोजित 17वें जोहार महोत्सव में इस अनूठी परंपरा का स्वाद लोगों को खूब भा रहा है।
सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की जोहार घाटी में रहने वाले परिवार सर्दियों की तैयारी कार्तिक मास (अक्तूबर-नवंबर) से ही शुरू कर देते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ठंड बढ़ने और हवा में नमी कम होने के साथ बकरी और भेड़ के मांस को धूप व खुली हवा में सुखाकर संरक्षित किया जाता है। यह सिलसिला मार्च तक चलने वाली सर्दियों के लिए खानपान का इंतजाम करने का पारंपरिक तरीका है।
जोहार महोत्सव में लगे एक स्टाल पर नंदा लस्पाल ने इस परंपरा की बारीकियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि सुबह बकरी या भेड़ के मांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर दिनभर खुली हवा और धूप में सुखाया जाता है। शाम को इन टुकड़ों को धागे में पिरोकर माला का आकार दिया जाता है। इसके बाद इन्हें सुरक्षित और ठंडे स्थान पर रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर मांस के टुकड़ों को निकालकर स्थानीय सब्जियों के साथ पकाया जाता है। संवाद
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एक हजार रुपये प्रति किलो है कीमत
आमतौर पर एक परिवार सर्दियों के लिए एक-दो भेड़ या बकरी का मांस संरक्षित करता है। महोत्सव में इस पारंपरिक तरीके से संरक्षित मांस को खरीदने के लिए शौका समुदाय के साथ दूसरे लोग भी पहुंच रहे हैं। स्टाल पर इसकी कीमत एक हजार रुपये प्रति किलो रखी गई है।
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पारंपरिक विरासत को सहेजने की कवायद
नंदा लस्पाल ने बताया कि उन्होंने यह तरीका अपनी सास से सीखा है। समुदाय की महिलाएं इस हुनर को अपनी बहुओं और नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। इस तरह महिलाएं न केवल परिवार की सर्दियों की खाद्य जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती हैं बल्कि पूर्वजों से मिली विरासत को भी सहेजने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
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सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की जोहार घाटी में रहने वाले परिवार सर्दियों की तैयारी कार्तिक मास (अक्तूबर-नवंबर) से ही शुरू कर देते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ठंड बढ़ने और हवा में नमी कम होने के साथ बकरी और भेड़ के मांस को धूप व खुली हवा में सुखाकर संरक्षित किया जाता है। यह सिलसिला मार्च तक चलने वाली सर्दियों के लिए खानपान का इंतजाम करने का पारंपरिक तरीका है।
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जोहार महोत्सव में लगे एक स्टाल पर नंदा लस्पाल ने इस परंपरा की बारीकियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि सुबह बकरी या भेड़ के मांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर दिनभर खुली हवा और धूप में सुखाया जाता है। शाम को इन टुकड़ों को धागे में पिरोकर माला का आकार दिया जाता है। इसके बाद इन्हें सुरक्षित और ठंडे स्थान पर रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर मांस के टुकड़ों को निकालकर स्थानीय सब्जियों के साथ पकाया जाता है। संवाद
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एक हजार रुपये प्रति किलो है कीमत
आमतौर पर एक परिवार सर्दियों के लिए एक-दो भेड़ या बकरी का मांस संरक्षित करता है। महोत्सव में इस पारंपरिक तरीके से संरक्षित मांस को खरीदने के लिए शौका समुदाय के साथ दूसरे लोग भी पहुंच रहे हैं। स्टाल पर इसकी कीमत एक हजार रुपये प्रति किलो रखी गई है।
पारंपरिक विरासत को सहेजने की कवायद
नंदा लस्पाल ने बताया कि उन्होंने यह तरीका अपनी सास से सीखा है। समुदाय की महिलाएं इस हुनर को अपनी बहुओं और नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। इस तरह महिलाएं न केवल परिवार की सर्दियों की खाद्य जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती हैं बल्कि पूर्वजों से मिली विरासत को भी सहेजने में अहम भूमिका निभा रही हैं।