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समय से नहीं भेजी एनओसी, फिर स्वीकार किया आवेदन
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी
Updated Wed, 12 Oct 2016 01:10 AM IST
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पंतनगर विश्वविद्यालय
- फोटो : अमर उजाला
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पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मंगला राय की मनमानी के कारनामे परत-दर-परत खुलते जा रहे हैं। पूर्व कुलपति के आगे सभी नियम-कायदे बौने साबित हुए। सहायक प्राध्यापक (मानव विकास एवं पारिवारिक अध्ययन) के पद पर भी मनचाहे अभ्यर्थी को नियुक्ति दी गई।
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समय से एनओसी न भेजने के बाद भी आवेदन पत्र स्वीकार कर लिया गया। पीड़ित पक्ष न्याय की गुहार लगाने हाईकोर्ट चला गया। हाईकोर्ट ने कुलाधिपति को दोनों पक्षों को बुलाकर मामले को निस्तारित करने के निर्देश दिए, लेकिन भी तक कुलाधिपति स्तर पर मामला लंबित है। इस पूरे मामले का खुलासा आरटीआई में हुआ है।
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सहायक प्राध्यापक मानव विकास एवं पारिवारिक अध्ययन के लिए शालिनी ठाकुर और रागिनी मिश्रा ने आवेदन किया था। एनओसी न आने के कारण और उचित तरीके से फॉर्म न आने के कारण 52 आवेदन विश्वविद्यालय ने निरस्त किए थे।
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रोचक तथ्य यह है कि रागिनी मिश्रा को नियुक्ति देने के लिए इन सभी नियमों को ताख पर रख दिया गया। फैजाबाद निवासी रागिनी राजस्थान में सेवारत थीं। उन्होंने नौ अगस्त 2015 को बनी एनओसी 12 जुलाई 2015 के कवरिंग लेटर के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन को भेजी। खास बात यह रही कि अनापत्ति प्रमाण पत्र आवेदन पत्र के साथ संलग्न नहीं था।
एनओसी भेजने की अंतिम तिथि 30 जुलाई 2015 थी। मिश्रा ने आवेदन पत्र में रिसर्च पेपर में लेखक का उल्लेख नहीं किया था, जिससे यह स्पष्ट नहीं है कि लेख उनका स्वयं का है या संयुक्त लेख है। संबंधित अभिलेखों के सम्मुख नास आईडी जनरल 01 जनवरी 2015 के अनुसार क्रमांक संख्या गलत अंकित की गई है।
सूत्रों की मानें तो रागिनी मिश्रा ने निर्धारित शुल्क भी जमा नहीं किया था। मिश्रा का आवेदन निर्धारित प्रारूप में नहीं था। फोटो सत्यापित नहीं कराए गए थे और मां का नाम नहीं लिखा गया था। फ ॉर्म की स्क्रीनिंग का काम डॉ. कल्पना कुलश्रेष्ठ ने किया था।
ऐसे में सवाल उठता है कि तमाम खामियों के चलते प्रारंभिक स्तर पर ही मिश्रा का आवेदन अन्य आवेदनों की तरह ही निरस्त हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दूसरी ओर, शालिनी ठाकुर के छह रिसर्च पेपर थे और नंबर सिर्फ चार में दिए गए थे। इस मामले में शालिनी ठाकुर ने 18 अप्रैल 2016 को कुलाधिपति से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। ठाकुर ने 14 सितंबर 2016 को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने कुलाधिपति को निर्देश दिए कि दोनों पक्षों को बुलाकर मामले को निस्तारित करें, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।