एक्सक्लूसिव: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उत्तराखंड के भवाली सेनेटोरियम में कराया था टीबी का इलाज
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देश जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है, ऐसे में उत्तराखंड के कुमाऊं के लिए यह गर्व की बात है कि देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने को अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले महान सेनानी नेताजी को देश को आजादी दिलाने की अपनी मुहिम के दौरान जेल में रहने के कारण बीमार पड़ने पर जब स्वास्थ्य लाभ की जरूरत पड़ी तो उन्हें कुमाऊं में सहारा और इलाज मिला था। सुभाष चंद्र बोस ने टीबी की बीमारी के कारण लंबे समय तक नैनीताल के भवाली स्थित सेनेटोरियम में अपना इलाज कराया था। इसके लिए वह यहां भर्ती भी रहे और वह इस संस्थान में कई बार आए।
जाने-माने इतिहासविद् प्रोफेसर अजय रावत ने अपनी पुस्तक पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ उत्तराखंड फ्रॉम स्टोन एज टू 1949 में इसका उल्लेख किया है। प्रो. रावत ने इस संबंध में 1980 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के कोलकाता वार्षिक अधिवेशन में एक शोधपत्र भी प्रस्तुत किया था, जिसमें इन तथ्यों का उल्लेख है। उत्तराखंड सरकार ने मूलरूप से 1904 में आईसीएसएचआर नेविल लिखित द गजेटियर ऑफ नैनीताल का वर्ष 2016 में पुनर्प्रकाशन कराया था, जिसका परिचय रस्किन बांड और प्रस्तावना तत्कालीन मुख्य सचिव एन रविशंकर और प्रो. रावत ने लिखी थी। इसमें भी सुभाष चंद्र बोस के भवाली में इलाज कराए जाने का उल्लेख है।
प्रो. रावत के अनुसार इस संबंध में पुरातात्विक साक्ष्यों के अध्ययन से प्रमाणित होता है कि वर्ष 1927 में नेताजी को टीबी का इलाज कराने की सलाह दी गई। उस वक्त भारत में टीबी का इलाज करने वाले संस्थान नहीं थे, जबकि भवाली स्थित सेनेटोरियम की बहुत अधिक मान्यता थी और यहां इस रोग के इलाज की बेहतरीन सुविधाएं थीं। उस दौर में तमाम नामचीन हस्तियां यहां टीबी से ग्रस्त होने पर स्वास्थ्य लाभ ले चुके थे, जिनमें जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू, खिलाफ त आंदोलन के नेता रहे शौकत अली बंधु, कैलाश नाथ काटजू, कुंदन लाल सहगल, प्रोफेसर यशपाल जैसे तमाम लोग शामिल थे।
प्रो. रावत के अनुसार उस वक्त पर नैनीताल एक विशिष्ट प्रशासनिक इकाई के रूप में स्थापित हो चुका था। यहां कार्यरत कर्मचारियों में बंगाली समुदाय के लोगों की अधिकता थी। इस कारण भी सुभाष चंद्र बोस को भवाली लाया जाना सुरक्षित माना गया। उनके अनुसार पहली बार वह यहां छद्म वेश धारण कर पहुंचे थे। इतिहासकार व कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल जोशी का मानना है कि सुभाष के रंगून (अब यंगून) की इंसिन जेल से रिहा होने के बाद 1927 की गर्मियों में बर्मा (अब म्यांमार) में सुभाष चंद्र बोस के चिकित्सक भाई शरत चंद्र बोस को उन्हें टीबी होने का संदेह हुआ और उन्होंने सुभाष को इलाज की सलाह दी। (संवाद)
पहले स्विट्जरलैंड में इलाज कराना चाहते थे सुभाष
सुभाष चंद्र बोस स्विट्जरलैंड में टीबी इलाज कराना चाहते थे, लेकिन वहां से उनके जर्मनी चले जाने की संभावना को देखते हुए उन्हें इसकी स्वीकृति नहीं मिल पाई। तब उन्होंने इलाज के लिए कुमाऊं का रुख किया, जहां गेठिया और भवाली में विशिष्ट जलवायु के कारण टीबी सेनेटोरियम स्थापित किए गए थे जिनकी बहुत अधिक प्रसिद्धि थी।
आजाद हिंद फौज में शामिल हो गईं थी गढ़वाल रेजिमेंट की दो बटालियनें
यहां यह तथ्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि गढ़वाल रेजिमेंट की दो बटालियन बाद में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गईं थीं और हिंद फौज में जनरल रहे मोहन सिंह सहित वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के पेशावर विद्रोह और सुभाष की रणनीति के समर्थक रहे तमाम लोगों का उनसे संपर्क इसी दौरान हुआ था। गढ़वाल रेजिमेंट की बटालियन के आजाद हिंद फौज में शामिल होने की पृष्ठभूमि भी उनके इलाज के दौरान ही बनी।