नैब ने बदल दी बच्चों की जिंदगी
गौलापार स्थित नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) में बच्चों की जिंदगी बदल गई है। यहां आकर उनका अनुशासन देखने लायक होता है। पहले छोटे और फिर बड़े बच्चे लाइन में लगकर भोजन प्राप्त करते हैं। भोजन करने से पहले सभी भोजन मंत्र का उच्चाकरण करते हैं।
वहीं योग करते समय भी बच्चे बिना शोरगुल किए सूर्य नमस्कार, पदमासन, वक्रासन आदि करते हैं, वहीं शाम के समय होने वाली आरती में खूब भजन गाते हैं। आपस में बैठकर पढ़ाई करने के साथ ही वे पहाड़ी हो या फिल्मी दोनों गानों को भरपूर मस्ती में गाते भी देखे जा सकते हैं।
प्रवक्ता बनना चाहते हैं हरीश
नंधौर वैली के रहने वाले हरीश सिंह शाही ने नैब में आकर चौथी कक्षा में प्रवेश लिया था। वर्तमान में वह एमबी इंटर कॉलेज में बारहवीं के छात्र हैं। कहते हैं कि जब वे संस्था में आए थे तो उन्हें कुछ नहीं आता था।
यहीं आकर ब्रेल लिपी, आत्मविश्वास सहित बहुत कुछ सीखा। दसवीं में 77 फीसदी अंक अर्जित किए। इस बार बोर्ड परीक्षा में 80 फीसदी से अधिक अंक लाने के लिए मेहनत कर रहे हैं।
स्कूल से आने के बाद वे पांच घंटे पढ़ाई करते हैं। स्कूल में टीचर का लेक्चर सुनते हैं और ब्रेल में नोट्स तैयार कर लेते हैं। जब दिक्कत आई है तो संस्था के शिक्षकों की मदद ले लेते हैं। कहते हैं कि पढ़ने में रुचि है और वे लेक्चचर बनना चाहते हैं।
यहां आकर बदल गई सुनील की दुनिया
पिथौरागढ़ निवासी सुनील राम कहते हैं कि उन्होंने छठी कक्षा में प्रवेश लिया था और अभी बारहवीं में हैं। दसवीं में उन्होंने 74 फीसदी अंक हासिल किए। वे बैंक में पीओ बनना चाहते हैं।
कहते हैं कि दो साल पहले तक उन्हें पढ़ाने वाली दिव्यांग शिक्षिका आरती यूनियन बैंक में पीओ बन गई थी। वे भी उन्ही की तरह पद पर जाना चाहते हैं।
कहते हैं कि घर में रहते हुए बस पहाड़े ही सीख पाया, यहां आकर तो सब कुछ बदल गया। बारहवीं में दसवीं से ज्यादा अंक लाने के लिए वे मेहनत में जुटे हैं।
नर्सरी के छात्र ने दो महीने में ही सीख ली ब्रेल
इसी साल अप्रैल में संस्था में आया कृष सिंह वैसे से नर्सरी का छात्र है, मगर अपना परिचय अंग्रेजी में देता है। पूछने पर अपना पता नेपाल बार्डर कहता है। कृष का कहना है कि वह डीएम बनना चाहता है।
उसने बाकी बच्चों से सुना है कि डीएम ही सभी समस्याओं का निदान करता है। वार्डन मीना सिंह बताती हैं कि कृष का परिवार नेपाली मूल का होने के साथ ही खानाबदोश है लेकिन उसमें सीखने की ललक ऐसी है कि आम तौर पर छह महीने में सीखी जाने वाली ब्रेल को उसने दो महीने में ही सीख लिया।
अब घर जाना नहीं चाहता हिमांशु
पिथौरागढ़ का रहने वाला हिमांशु कुमार भी पिछले साल नवंबर में संस्था में आया था। परिवार से अलग रहने पर केवल चार दिन रोया और अब उसे परिजनों की याद नहीं आती।
कहता है कि पुलिस अफसर बनूंगा और गलत करने वालों को जेल में डाल दूंगा। वार्डन बताती हैं कि हिमांशु शैतानी बहुत करता है। जब उसे घर भेजने की बात कही जाती है तो वह शांत हो जाता है। हिमांशु ने भी केवल तीन महीने में ब्रेल सीख ली थी।
शिक्षिका बनना चाहती है तराना
हल्द्वानी क्षेत्र में रहने वाली तराना आर्य पहली की छात्रा है। परिजनों से काफी गुजारिश के बाद मार्च में उसे संस्था में लाया गया था। वह चलना नहीं जानती थी लेकिन संस्था में आने के बाद वह चलना तो सीखी ही, साथ में दो महीने में ब्रेल भी सीख गई।
उसकी मधुर आवाज के सब कायल हैं। वह शिक्षिका बनना चाहती है, क्योंकि उसे पढ़ाना बेहद पसंद है। एक गाना वह खूब गाती है कि ये मत कहो खुदा से मुश्किलें बड़ी हैं, मुश्किलों से कह दो मेरा खुदा बड़ा है।