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हरिद्वार में बूचडखानों पर लगी रोक पर सुनवाई बकरीद के बाद

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sat, 17 Jul 2021 10:36 PM IST
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Hearing on ban on slaughterhouses in Haridwar after Bakrid
नैनीताल। हाईकोर्ट ने हरिद्वार जिले में बूचड़खानों पर रोक लगाने के फैसले पर व्यापक विचार की जरूरत बताते हुए कहा कि सभ्य समाज में विभिन्न वर्गों के साथ समान व्यवहार का बहुत महत्व होता है। हरिद्वार जिले में बूचड़खाने पर रोक लगाने के फैसले को चुनौती देने के लिए मंगलौर कस्बे के रहने वाले याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई के बाद ने कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में सभी वर्गों के अधिकारों की रक्षा का दायित्व सरकार का होता है। इस मामले पर फैसला बकरीद तक करना संभव नहीं है जो 21 जुलाई को पड़ रही है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 जुलाई की तारीख तय की है।
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मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार इफतखार व अन्य ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि यह पाबंदी निजता के अधिकार, जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता से अपने धार्मिक रीति रिवाजों का अनुपालन करने के अधिकार का उल्लंघन करती है। यह हरिद्वार में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभावपूर्ण है जहां पर मंगलौर जैसे कस्बे में बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है। याचिका में कहा गया कि हरिद्वार में धर्म और जाति की सीमा और सभ्यता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और हरिद्वार जैसी पाबंदी से सवाल उठता है कि राज्य किस हद तक नागरिकों के विकल्पों को तय कर सकता है। याचिका में बकरीद से पहले मामले पर निर्णय की मांग की गई थी।
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गौरतलब है कि इस साल मार्च में राज्य सरकार ने हरिद्वार को बूचड़खानों से मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया था और बूचड़खानों के लिए जारी अनापत्तिपत्रों को भी रद्द कर दिया था। याचिका में दावा किया गया कि पाबंदी का निर्णय मनमाना और असांविधानिक है, जबकि उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम में उत्तराखंड सरकार द्वारा जोड़ी गई धारा-237ए, उसे नगर निगम, परिषद या नगर पंचायत को बूचड़खाना मुक्त घोषित करने का अधिकार प्रदान करती है। कोर्ट ने कहा कि याचिका में उठाए गए सवालों पर जल्दबाजी में विचार नहीं किया जा सकता और इसमें संाविधानिक व्यवस्था सहित अन्य पहलुओं पर विचार शामिल है। संवाद
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