{"_id":"59e3c5384f1c1b65548b7af8","slug":"happy-to-the-light-of-divya-bhuvan","type":"story","status":"publish","title_hn":"दिव्यांग भुवन के हौसले को सलाम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दिव्यांग भुवन के हौसले को सलाम
अभिजात कांडपाल
Updated Mon, 16 Oct 2017 01:59 AM IST
विज्ञापन
दिव्यांग भुवन के हौसले को सलाम
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
46 साल के भुवन चंद्र गुणवंत दोनों पैरों से दिव्यांग हैं मगर जुनून ऐसा कि हर कोई दंग रह जाए। बचपन में सीखी तैराकी अब उनके काम आ रही है। वह न सिर्फ कई प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं बल्कि आगे भी प्रदेश और देश का नाम रोशन करने का माद्दा रखते हैं।
विज्ञापन
पैरालंपिक एसोसिएशन की ओर से श्री स्पोर्ट्स स्टेडियम देहरादून में हुई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर लौटे गुणवंत अब नवंबर में राजस्थान के उदयपुर में होने वाली राष्ट्रीय स्तर की पैरालंपिक प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं।
विज्ञापन
हल्दूचौड़ के दौलिया गांव के भुवन चंद्र गुणवंत दिसंबर 2009 में सड़क हादसे में दोनों पैर गंवा चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह पिकअप चलाकर परिवार का गुजारा कर रहे थे। अचानक दुखों का पहाड़ टूटा तो हादसा हो गया। पूरे सपने चकनाचूर हो गए।
विज्ञापन
परिवार के सामने गुजर-बसर का संकट आ पड़ा। दो बच्चे हैं। शासन और प्रशासन से मदद की गुहार लगाई गई लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली। फिर सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे न सिर्फ गुजारा हो बल्कि समाज में उनके जैसे लोगों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले।
बचपन में पैतृक गांव सिमराड़ सुयालबाड़ी में रहते हुए नदियों-गधेरों को पार करते समय तैराकी सीखी थी। सोचा क्यों न इस शौक को ही अब जीने का जरिया बनाया जाए। सरकार की चौखट पर इसमें मौका देने की भी गुहार लगाई मगर कुछ हासिल नहीं हो सका।
2014 में वह पैरालंपिक एसोसिएशन के संपर्क में आए तो उम्मीद की किरण दिखाई दी। भुवन के अनुसार उन्हें लगा डूबते को तिनके का सहारा मिल गया है। पैरालंपिक एसोसिएशन के तहत वे जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय तैराकी प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं। कहते हैं अब पीछे मुड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हर हाल में मंजिल पाकर ही दम लेंगे।
मुफलिसी में गुजार रहे दिन
भुवन चंद्र गुणवंत मुफलिसी में दिन गुजा रहे हैं। दो बच्चों के पिता भुवन कहते हैं कि परिवार का गुजर बसर मां का मिलने वाली पेंशन और पत्नी पूर्णिमा को आंगनबाड़ी कार्यकत्री के रूप में मिलने वाले मानदेय से होता है। उन्होंने बताया कि बड़ा बेटा 11 वीं में जबकि छोटा बेटा छठी में पढ़ता है।