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कॉरिडोर बंद होने से एक क्षेत्र में सिमटकर रह गए हाथी
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रामनगर वाइल्ड लाइफ़ फोटोग्राफर दीप रजवार द्वारा खींची गई हाथियों के झुंड की फोटो। वहीं उनका मनन?
- फोटो : RAMNAGAR
हल्द्वानी। शिवालिक बेल्ट के कॉरिडोर बंद होने के कारण हाथियों का विचरण एक क्षेत्र तक सीमित रह गया है। तराई और भाबर में मिश्रित वनों की कमी के कारण भी हाथी भोजन की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं। इस कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहे हैं।
हाथी कॉरिडोर यानी एक ऐसा गलियारा या रास्ता जहां बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हाथी एक जगह से दूसरी जगह स्वच्छंद रूप से विचरण कर सकें। बढ़ता शहरीकरण, फैलता सड़कों का जाल और सिकुड़ते जंगलों के कारण वर्तमान में सबसे बड़ा संकट वन्य जीवों के स्वच्छंद विचरण पर आ खड़ा हुआ है। दक्षिण पतली दून-चिलकिया कॉरिडोर, चिलकिया-कोटा, कोट-मैलामी, फतेहपुर-गदगरिया, गौला रौखड़-गौराई टांडा, किलपुरा-खटीमा-सुरई हाथी कॉरिडोर में से कई बंद हो गए हैं। कालागढ़ डैम बनने से भी हाथियों के स्वछंद विचरण में प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उपनिदेशक जीएस कार्की ने बताया कि हाथियों के रूट में बदलाव देखा जा रहा है। पुराने हाथी कॉरिडोर के अलावा हाथियों ने अपने नए रूट बना लिए हैं।
वास स्थल की कमी, अस्तित्व पर खतरा
रामनगर (नैनीताल)। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) इंडिया के अनुसार वास स्थल की कमी एवं विखंडन हाथियों के अस्तित्व के लिए मुख्य खतरों में से एक है। हाथियों के कॉरिडोर लगातार खत्म होते जा रहे है। हाथियों को अवैध शिकारी टास्क के लिए भी मार देते हैं।
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भारत में लगभग 50000 जंगली हाथी पाए जाते हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 2019 में हुई गणना में 1135 हाथी रिकॉर्ड हुए है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सीनियर प्रोजेक्ट ऑफिसर सारिक सैफी ने कहा कि चूंकि हाथियों की एक अर्थपूर्ण आबादी संरक्षित वन क्षेत्रों के बाहर मुख्यत: कृषि भूमि एवं मानवीय बस्तियों के आस पास रहती है जिसके कारण अक्सर मानव हाथी संघर्ष की घटनाएं जैसे की फसल क्षति, जानमाल की क्षति आदि की खबरें आती रहती हैं। (संवाद)
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हाथी कॉरिडोर यानी एक ऐसा गलियारा या रास्ता जहां बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हाथी एक जगह से दूसरी जगह स्वच्छंद रूप से विचरण कर सकें। बढ़ता शहरीकरण, फैलता सड़कों का जाल और सिकुड़ते जंगलों के कारण वर्तमान में सबसे बड़ा संकट वन्य जीवों के स्वच्छंद विचरण पर आ खड़ा हुआ है। दक्षिण पतली दून-चिलकिया कॉरिडोर, चिलकिया-कोटा, कोट-मैलामी, फतेहपुर-गदगरिया, गौला रौखड़-गौराई टांडा, किलपुरा-खटीमा-सुरई हाथी कॉरिडोर में से कई बंद हो गए हैं। कालागढ़ डैम बनने से भी हाथियों के स्वछंद विचरण में प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उपनिदेशक जीएस कार्की ने बताया कि हाथियों के रूट में बदलाव देखा जा रहा है। पुराने हाथी कॉरिडोर के अलावा हाथियों ने अपने नए रूट बना लिए हैं।
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वास स्थल की कमी, अस्तित्व पर खतरा
रामनगर (नैनीताल)। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) इंडिया के अनुसार वास स्थल की कमी एवं विखंडन हाथियों के अस्तित्व के लिए मुख्य खतरों में से एक है। हाथियों के कॉरिडोर लगातार खत्म होते जा रहे है। हाथियों को अवैध शिकारी टास्क के लिए भी मार देते हैं।
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भारत में लगभग 50000 जंगली हाथी पाए जाते हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 2019 में हुई गणना में 1135 हाथी रिकॉर्ड हुए है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सीनियर प्रोजेक्ट ऑफिसर सारिक सैफी ने कहा कि चूंकि हाथियों की एक अर्थपूर्ण आबादी संरक्षित वन क्षेत्रों के बाहर मुख्यत: कृषि भूमि एवं मानवीय बस्तियों के आस पास रहती है जिसके कारण अक्सर मानव हाथी संघर्ष की घटनाएं जैसे की फसल क्षति, जानमाल की क्षति आदि की खबरें आती रहती हैं। (संवाद)