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दारमा घाटी का बौन गांव बना जिले का पहला हर्बल गांव

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 05 Jul 2022 11:49 PM IST
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Airoma Farming in Baun Village
बौन गांव में इस तरह की जा रही है जड़ी बूटी की खेती। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित दारमा घाटी का बौन गांव जिले का पहला हर्बल गांव बन गया है। यहां के ग्रामीण जड़ी-बूटी की खेती कर 10 से 15 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं। ग्रामीण अपने खेतों में दुर्लभ जड़ी बूटियों का उत्पादन कर रहे हैं।
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दारमा घाटी धौली नदी के आसपास बसी है। यहां पंचाचूली बेस कैंप, व्यक्सी, जिंपा, गब्बे आचरी ताल, महादेव गुफा आदि प्रसिद्ध पर्यटक स्थल हैं। इस घाटी में बसे 14 गांव सेला, चल नामलिंग, बालिंग, दुग्तू, दांतू, गौ, फिलम, बौन, ढाकर, तिदांग, मार्छा, सीपू के ग्रामीण पारंपरिक तरीके से जड़ीबूटी की खेती करते हैं। इस घाटी में मुख्य रूप से पल्ती, फाफर, राजमा, आलू, मूली उगाई जाती है। इस घाटी के सबसे बड़े गांव बौन को हर्बल गांव के रूप में विकसित किया गया है।
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जड़ी बूटी शोध संस्थान के शाखा प्रभारी डॉ. वीपी भट्ट ने बताया कि संस्थान से सबसे पहले वर्ष 2009-10 में इस घाटी में मिलने वाले औषधीय पादपों का सर्वेक्षण किया। उस समय लोगों को जड़ी बूटी की खेती की जानकारी कम थी। संस्थान ने गांव के किसानों को जड़ी-बूटी के बीज और पौधे दिए। इसके बाद ग्रामीणों ने औषधीय पादपों की व्यावसायिक खेती करनी शुरू की। ग्रामीणों ने दो हेक्टेयर से अधिक भूमि पर जेबू, कूठ, अतीस, कुटकी, काला जीरा, गंद्रायण, डोलू, वन ककड़ी, अमेश की खेती की। अब किसान जड़ी बूटी का उत्पादन कर सालाना 10 से 15 लाख रुपये तक कमा रहे हैं।
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बौन के ग्रामीणों ने इस गांव को हर्बल गांव के रूप विकसित करने का श्रेय जड़ी बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीपी भट्ट को दिया। ग्रामीणों का कहना है कि जड़ी बूटी की खेती से सीमांत के लोगों को रोजगार मिला है। ग्रामीण चैत सिंह बौनाल, जसमल सिंह बौनाल, मोहन सिंह बौनाल, किशन राम बौनाल आदि ने जड़ी बूटी की खेती के लिए घेरबाड़ की जरूरत बताई है।

बौन गांव के ग्रामीण कर रहे दुर्लभ हत्थाजड़ी का संरक्षण
पिथौरागढ़। दारमा घाटी के बौन गांव के ग्रामीण हिमालय की दिव्य हत्थाजड़ी का भी संरक्षण कर रहे हैं। यह आर्किड प्रजाति का पौधा है। इसकी बाजार में सबसे ज्यादा मांग है। इसके कंद की कीमत 10000 रुपये प्रति किलो है। ग्रामीण नई प्रजाति की जड़ीबूटी पुष्कर मल की भी खेती कर रहे हैं। यह मुख्य रूप से जम्मू कश्मीर के उच्च शिखरीय क्षेत्रों में पाया जाता है। जड़ी बूटी शोध संस्थान ने मुनस्यारी स्थित पौधशाला से बौन गांव के किसानों को जड़ीबूटी के पौधे उपलब्ध कराए हैं।
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