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अब प्रदेश में वकीलों की हड़ताल पर भी हाईकोर्ट की रोक
Nainital
Updated Wed, 19 Nov 2014 05:30 AM IST
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हल्द्वानी/नैनीताल। सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल पर रोक लगाने के साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य के सभी न्यायालयों के वकीलों की हड़ताल पर भी रोक लगा दी है। यह निर्णय हाईकोर्ट की फुल बैंच की ओर से लिया गया है। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल डीपी गैरोला ने कोर्ट के इस निर्णय के संबंध में राज्य के सभी जिला, पारिवारिक एवं अन्य न्यायालयों को पत्र जारी कर निर्णय की सूचना दी है।
श्री गैरोला ने पत्र में हाईकोर्ट के निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि हाईकोर्ट की फुल बैंच ने हाल में इस संबंध में आदेश जारी किया है। पत्र में कहा गया है कि हाईकोर्ट सहित जिला एवं अन्य निचली अदालतों के वकीलों को किसी भी स्थिति में हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है। यह अपने वादकारियों के हितों के विरुद्ध तथा व्यावसायिक अनाचार है। हड़ताल की स्थिति में कोर्ट वकीलों के प्रकरण में तारीख लगाने को बाध्य नहीं है, बल्कि कोर्ट हड़ताल की स्थिति में वकीलों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रखें।
इसमें सुप्रीम कोर्ट के 1984 के एसजे चौधरी बनाम स्टेट, 1999 के महाबीर प्रसाद सिंह बनाम जैक्स एविएशन प्राइवेट लिमिटेड, 2001 के रोमन सर्विस प्राईवेट लिमिटेड बनाम सुभाष कपूर एवं अन्य, 2003 के एक्स कैप्टन हरीश उप्पल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णयों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी कोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों के संगठन हड़ताल नहीं कर सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि हड़ताल या कोर्ट का बहिष्कार तो दूर संगठन हड़ताल का आह्वान या इस संबंध में बैठक तक नहीं कर सकते हैं। वकील यदि हड़ताल करते हैं तो कोर्ट उन पर व्यक्तिगत जुर्माना लगाने के अलावा उनसे वादकारियों को मुआवजा भी दिलवा सकता है। इसमें बताया गया है कि वकील अपनी जायज मांगोें के संबंध में कोर्ट परिसर से बाहर शांतिपूर्वक धरना, जुलूस या बांह में पट्टी बांधकर विरोध-प्रदर्शन या समाचार पत्रों अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में बयान जारी कर सकते हैं, लेकिन हड़ताल जैसी कार्यवाही नहीं कर सकते। इसके अनुसार अतिदुर्लभ मामलों में जहां न्यायपालिका एवं बार की स्वतंत्रता और गरिमा खतरे में हो, वहां संबंधित कोर्ट केवल एक दिन की हड़ताल की अनदेखी कर सकते हैं, लेकिन यह निर्णय संबंधित कोर्ट ही लेगा कि उस प्रकरण में वास्तव में न्यायपालिका एवं बार की स्वतंत्रता और गरिमा खतरे में है या नहीं। इस संबंध में संबंधित बार एसोसिएशन या बार काउंसिल के अध्यक्ष चीफ जस्टिस या जिला न्यायाधीश से पूर्व में ही वार्ता करेंगे।
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श्री गैरोला ने पत्र में हाईकोर्ट के निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि हाईकोर्ट की फुल बैंच ने हाल में इस संबंध में आदेश जारी किया है। पत्र में कहा गया है कि हाईकोर्ट सहित जिला एवं अन्य निचली अदालतों के वकीलों को किसी भी स्थिति में हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है। यह अपने वादकारियों के हितों के विरुद्ध तथा व्यावसायिक अनाचार है। हड़ताल की स्थिति में कोर्ट वकीलों के प्रकरण में तारीख लगाने को बाध्य नहीं है, बल्कि कोर्ट हड़ताल की स्थिति में वकीलों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रखें।
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इसमें सुप्रीम कोर्ट के 1984 के एसजे चौधरी बनाम स्टेट, 1999 के महाबीर प्रसाद सिंह बनाम जैक्स एविएशन प्राइवेट लिमिटेड, 2001 के रोमन सर्विस प्राईवेट लिमिटेड बनाम सुभाष कपूर एवं अन्य, 2003 के एक्स कैप्टन हरीश उप्पल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णयों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी कोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों के संगठन हड़ताल नहीं कर सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि हड़ताल या कोर्ट का बहिष्कार तो दूर संगठन हड़ताल का आह्वान या इस संबंध में बैठक तक नहीं कर सकते हैं। वकील यदि हड़ताल करते हैं तो कोर्ट उन पर व्यक्तिगत जुर्माना लगाने के अलावा उनसे वादकारियों को मुआवजा भी दिलवा सकता है। इसमें बताया गया है कि वकील अपनी जायज मांगोें के संबंध में कोर्ट परिसर से बाहर शांतिपूर्वक धरना, जुलूस या बांह में पट्टी बांधकर विरोध-प्रदर्शन या समाचार पत्रों अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में बयान जारी कर सकते हैं, लेकिन हड़ताल जैसी कार्यवाही नहीं कर सकते। इसके अनुसार अतिदुर्लभ मामलों में जहां न्यायपालिका एवं बार की स्वतंत्रता और गरिमा खतरे में हो, वहां संबंधित कोर्ट केवल एक दिन की हड़ताल की अनदेखी कर सकते हैं, लेकिन यह निर्णय संबंधित कोर्ट ही लेगा कि उस प्रकरण में वास्तव में न्यायपालिका एवं बार की स्वतंत्रता और गरिमा खतरे में है या नहीं। इस संबंध में संबंधित बार एसोसिएशन या बार काउंसिल के अध्यक्ष चीफ जस्टिस या जिला न्यायाधीश से पूर्व में ही वार्ता करेंगे।
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