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यूपी व उत्तराखंड का सीएम न बन पाने का मलाल रहा पंतजी को

Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
Nainital
Nainital Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
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नैनीताल। नैनीताल में जन्म, पले बढ़े और अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमके कृष्ण चंद्र पंत के देहांत के साथ भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत की राजनैतिक विरासत का अंत हो गया। देश के रक्षा मंत्रालय सहित गृह, वित्त, भारी उद्योग, इस्पात जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभालने के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक, एटोमिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धि पाने और दशम वित्त आयोग के उपाध्यक्ष रह चुकने के बावजूद उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड का मुख्यमंत्री न बन पाने का दर्द श्री पंत को सालता रहा। इसी के चलते उन्होंने पहले कांग्रेस छोड़ी बाद में राजनीति से ही किनारा कर लिया। तराई को बसाने और उत्तराखंड का बजट बढ़वाने में उनकी भूमिका यादगार है।
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श्री पंत का जन्म 1931 में नैनीताल में हुआ था। वह यहां तल्लीताल में नया बाजार में रहते थे। उनकी शिक्षा सेंट जोजफ कालेज में हुई। लखनऊ से उन्होंने एमएससी की। उनका विवाह भी नैनीताल में हुआ यही उनकी कर्मभूमि भी रही। गोविंद बल्लभ पंत की संतान होने के नाते शुरूआती दौर में श्री पंत को राजनीति में मुकाम बनाने को संघर्ष नहीं करना पड़ा। 1962 में मात्र 31 वर्ष की आयु में वह नैनीताल सीट से कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। 1967 और 1971 में भी उन्होंने यहां से जीत दर्ज की। 1977 की जनता लहर में वह भारत-भूषण से हार गए लेकिन 1978 में उन्हें राज्यसभा सांसद मनोनीत किया गया और वह राज्यसभा के सभापति भी रहे। 1984 में वह नई दिल्ली से सांसद बने और राजीव गांधी के विश्वस्त बनकर रक्षा मंत्री पद तक पहुंचे।
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नारायण दत्त तिवारी से राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते श्री पंत चाहकर भी यूपी के सीएम नहीं बन पाये और उनका कांग्रेस से मोह भंग हो गया। श्री तिवारी से इसी नाराजगी के चलते पत्नी इला पंत को मई 1991 में भाजपा की सदस्यता दिलवा दी और इला पंत ने 1991 के आम चुनावों में खुलकर भाजपा प्रत्याशी बलराज पासी का प्रचार किया। तराई में पंत परिवार के व्यापक जनसमर्थन के चलते पासी को इसका लाभ मिला और पासी एनडी तिवारी को हराने में सफल रहे। 1996 में स्वयं इला पंत ने श्री तिवारी के खिलाफ भाजपा के टिकट पर नैनीताल से चुनाव लड़ा और विजयी रही। 1998 में श्री पंत भी बाकायदा भाजपा में शामिल हो गये और अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के दौरान दशम वित्त आयोग के उपाध्यक्ष बनाये गए। 90 के दशक में पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनकी बिशेष भूमिका नहीं रही। पृथक राज्य बनने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री बाजपेयी की पहली पसंद होने के बाद भी वह राज्य के सीएम नहीं बन पाये क्यों कि विधान सभा चुनाव को बहुत कम समय शेष था और विधायकों में से ही सीएम बनाने की मांग उन पर भारी पड़ गयी इसके बाद से 68 वर्ष आयु में ही उन्होंने सक्रिय राजनीति से किनारा कर लिया।
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श्री पंत ने बोफोर्स तोप सौदे पर कैग रिपोर्ट में आपत्ति जताने पर रक्षा मंत्री की हैसियत से सदन में पीएम राजीव गांधी का जबरदस्त बचाव किया। श्रीलंका में शांति सेना भेजने व मालदीप में सेना भेजने पर उनका त्वरित एक्शन सराहा गया। पृथक तेलंगाना राज्य की मांग पर प्रबल आंदोलन उन्हीं की मध्यस्थता के बाद समाप्त हुआ। श्री पंत ने दमन में प्रथम कोस्टगार्ड एयर स्टेशन स्थापित करवाने व प्रथम फ्लैगशिप एयरक्राफ्ट आईएनएस विराट सहित मिग -29 को सेना में शामिल कराने तथा एनर्जी एडवाईजरी बोर्ड अध्यक्ष के नाते पोखरण परमाणु विस्फोट में उल्लेखनीय योगदान दिया। तराई को बसाने और इसके विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वित्त आयोग के उपाध्यक्ष के नाते श्री पंत ने उत्तराखंड का बजट 300 से बढ़ाकर 500 करोड़ कराया।

बावजूद इसके स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा,एनडी तिवारी और वीर बहादुर सिंह के वर्चस्व के चलते श्री पंत यूपी के सीएम न बन सके। अपने पुत्र सुनील को राजनीति में स्थापित करने की उनकी इच्छा सुनील की रुचि ना होने के चलते अधूरी रह गयी। उनके देहांत के साथ ही भारत रत्न पंडित पंत की राजनैतिक विरासत भी समाप्त हो गयी है।
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