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बिना अनुमति के प्रदेश के जंगलों में शोध नहीं होगा
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हल्द्वानी। प्रदेश के जंगलों में बिना अनुमति के कोई संस्था, छात्र या संस्थान शोध नहीं कर सकेंगे। इसके लिए वन विभाग से अनुमति लेनी होगी। साथ ही वन विभाग को शोध पत्र भी देना होगा। राज्य के प्रमुख वन संरक्षक ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं।
प्रदेश के जंगलों में शोध करने वाले संस्थान, एनजीओ, शोधार्थी पहले वन विभाग को सूचना नहीं देते थे। इसके अलावा शोध करने के बाद वन विभाग को शोध पत्र भी नहीं देते थे। कई बार अपने ही वनों में हुए शोध की जानकारी मांगने पर संस्थानों ने पेटेंट का हवाला देकर शोध पत्र नहीं दिया। जून के पहले सप्ताह में वन संरक्षक अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी ने इस मामले को लेकर प्रमुख वन संरक्षक को पत्र लिखा था। साथ ही शोध के लिए लिए नियम बनाने का अनुरोध किया था। इधर, प्रमुख वन संरक्षक ने शोध को लेकर कई नियम बना दिए हैं।
बिना अनुमति के प्रदेश के जंगलों में शोध नहीं होगा
उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक ने जारी किया आदेश
अमर उजाला ने सात जून को शोध की खामियों को लेकर प्रकाशित की थी खबर
अमर उजाला ने प्रकाशित की थी खबर
अमर उजाला ने वनों में शोध की खामियों को लेकर बीते सात जून को प्रदेश के जंगलों का शोध पराया शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इसके बाद प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड जयराज ने आदेश जारी किया है।
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शोध के लिए लेनी होगी अनुमति
1-शोध के लिए आए आवेदन अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान हल्द्वानी को भेजे जाएंगे।
2-अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान आवेदन की जांच करेंगे और शोध के लायक पाए जाने पर ड्राफ्ट पत्र के माध्यम से प्रमुख वन संरक्षक को अनुमति के लिए भेजेंगे।
3-यदि किसी शोध के लिए वन्यजीव प्रतिपालक की अनुमति जरूरी होगी तो उसे समय अनुसार लेकर प्रमुख वन संरक्षक को भेजा जाए।
4-दीर्घकालिक शोध के लिए अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान जरूरी समझें तो शोधकर्ता का प्रमुख वन संरक्षक के समक्ष प्रस्तुतीकरण करा सकते हैं।
5-प्रत्येक शोध से पहले शोधार्थी से इस बात का अंडरटेकिंग लेना अनिवार्य होगा कि शोध के परिणामों से वन विभाग को अवगत कराएंगे। इसे अपर प्रमुख वन संरक्षक वन अनुसंधान कार्यालय में सुरक्षित रखा जाएगा। इस शोध को वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा तथा संवर्धन के लिए प्रयोग किया जाएगा।
6-शोध के लिए आए आवेदनों को दो सप्ताह के भीतर ही निस्तारित करना होगा।
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प्रदेश के जंगलों में शोध करने वाले संस्थान, एनजीओ, शोधार्थी पहले वन विभाग को सूचना नहीं देते थे। इसके अलावा शोध करने के बाद वन विभाग को शोध पत्र भी नहीं देते थे। कई बार अपने ही वनों में हुए शोध की जानकारी मांगने पर संस्थानों ने पेटेंट का हवाला देकर शोध पत्र नहीं दिया। जून के पहले सप्ताह में वन संरक्षक अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी ने इस मामले को लेकर प्रमुख वन संरक्षक को पत्र लिखा था। साथ ही शोध के लिए लिए नियम बनाने का अनुरोध किया था। इधर, प्रमुख वन संरक्षक ने शोध को लेकर कई नियम बना दिए हैं।
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बिना अनुमति के प्रदेश के जंगलों में शोध नहीं होगा
उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक ने जारी किया आदेश
अमर उजाला ने सात जून को शोध की खामियों को लेकर प्रकाशित की थी खबर
अमर उजाला ने प्रकाशित की थी खबर
अमर उजाला ने वनों में शोध की खामियों को लेकर बीते सात जून को प्रदेश के जंगलों का शोध पराया शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इसके बाद प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड जयराज ने आदेश जारी किया है।
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शोध के लिए लेनी होगी अनुमति
1-शोध के लिए आए आवेदन अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान हल्द्वानी को भेजे जाएंगे।
2-अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान आवेदन की जांच करेंगे और शोध के लायक पाए जाने पर ड्राफ्ट पत्र के माध्यम से प्रमुख वन संरक्षक को अनुमति के लिए भेजेंगे।
3-यदि किसी शोध के लिए वन्यजीव प्रतिपालक की अनुमति जरूरी होगी तो उसे समय अनुसार लेकर प्रमुख वन संरक्षक को भेजा जाए।
4-दीर्घकालिक शोध के लिए अपर प्रमुख वन संरक्षक अनुसंधान जरूरी समझें तो शोधकर्ता का प्रमुख वन संरक्षक के समक्ष प्रस्तुतीकरण करा सकते हैं।
5-प्रत्येक शोध से पहले शोधार्थी से इस बात का अंडरटेकिंग लेना अनिवार्य होगा कि शोध के परिणामों से वन विभाग को अवगत कराएंगे। इसे अपर प्रमुख वन संरक्षक वन अनुसंधान कार्यालय में सुरक्षित रखा जाएगा। इस शोध को वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा तथा संवर्धन के लिए प्रयोग किया जाएगा।
6-शोध के लिए आए आवेदनों को दो सप्ताह के भीतर ही निस्तारित करना होगा।