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चंपावत: देवीधुरा में आठ मिनट तक वीरों की बगवाल, चार खामों और सात थोकों के रणबांकुरों ने निभाई अनूठी परंपरा

Sat, 29 Aug 2026 12:04 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, चंपावत
अमर उजाला नेटवर्क, चंपावत Published by: Heera Updated Sat, 29 Aug 2026 12:04 PM IST
सार

मां वाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के अवसर पर भव्य बगवाल मेले का आयोजन हुआ, जिसमें चार खाम और सात थोक के वीरों ने आठ मिनट तक सदियों पुरानी बगवाल परंपरा का निर्वहन किया, और हजारों लोग इस ऐतिहासिक आयोजन के साक्षी बने।

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Eight minutes of heroic rebellion in Devidhura
मां वाराही धाम देवीधुरा के खोलीखांड दुबाचौड़ मैदान में बगवाल खेलते बगवाल वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां वाराही धाम देवीधुरा में शुक्रवार को ऐतिहासिक बगवाल मेले का भव्य आयोजन हुआ। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर आयोजित मेले में आस्था, परंपरा, संस्कृति और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। चार खाम और सात थोक के वीर बगवालियों ने आठ मिनट तक बगवाल खेलकर सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत रखा। हजारों लोग इस ऐतिहासिक आयोजन के साक्षी बने।

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बगवाल दोपहर 1:48 बजे शुरू हुई और 1:55 बजे समाप्त हुई। प्रधान पुजारी की ओर से विधिवत पूजा-अर्चना के बाद बगवाल का शुभारंभ किया गया। इसके बाद चारों खाम वालिक (सफेद), चम्याल (गुलाबी), गहड़वाल (नारंगी) और लमगड़िया (पीला) के बगवालियों ने मैदान में प्रवेश किया। अलग-अलग रंगों के पारंपरिक परिधानों और पगड़ियों में सजे बगवालियों के हाथों में बांस और रिंगाल से निर्मित ढालें थीं। शंखनाद और मां वाराही के जयकारों के बीच बगवाल शुरू हुई। बगवालियों ने एक-दूसरे पर फल-फूल बरसाए। इस दौरान पूरा क्षेत्र मां वाराही के जयकारों से गूंज उठा। हजारों श्रद्धालुओं और दर्शकों ने ऐतिहासिक बगवाल का रोमांच देखा और इस अनूठी परंपरा के साक्षी बने। ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुवाचौड़ मैदान में पहले चारों खामों में गहड़वाल, चम्याल, वालिक, लमगड़िया और सातों थोकों के बगवाली वीरों ने मां वज्र वाराही के जयकारे लगाकर शक्तिपीठ की परिक्रमा की। वालिक खाम के मुखिया बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में सफेद ड्रेस में वीर मंदिर पहुंचे। गंगा सिंह चम्याल के नेतृत्व में गुलाबी ड्रेस में चम्याल खाम वीर पहुंचे। वीरेंद्र सिंह लमगड़िया के नेतृत्व में पीले वस्त्र में लमगड़िया खाम बगवाल वीर पहुंचे। गहड़वाल खाम के त्रिलोक सिंह बिष्ट के नेतृत्व नारंगी कुर्ते में बगवाली वीरों ने मैदान में प्रवेश किया। इसके बाद चारों खामों के योद्धा अपने-अपने मोर्चे पर डट गए।

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मां वाराही धाम मंदिर के मुख्य पुजारी महेश चंद्र ने शंख ध्वनि के साथ बगवाल का शुभारंभ दोपहर 1:48 बजे किया। मंदिर छोर से वालिक और लमगड़िया खाम ने फल-फूल बरसाकर बाद में पत्थर, डंडे, छोटे फरें बरसाकर बगवाल खेली। पूर्वी छोर से चम्याल और गहड़वाल खाम ने मोर्चा संभाला। वहीं मंदिर छोर से वालिक और लमगड़िया खाम ने मोर्चा संभाला। पहले नाशपाती, सेब और फूलों से बगवाल खेली गई। इसके बाद पत्थर और लाठियां भी चलीं। इस दौरान 180 बगवाली वीर और दर्शक घायल हुए। इनमें से गंभीर रूप से घायल बगवाली वीरों को 108 एंबुलेंस के माध्यम से जिला अस्पताल पहुंचाया गया। इसके अलावा बगवाली वीरों के नाक, पांव और चेहरे समेत अन्य शरीर के हिस्सों पर चोटें आईं।

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कुछ घायलों को स्वास्थ्य टीम ने टांके लगाए। कुछ को प्राथमिक इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई। मुख्य अतिथि के तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा और सांसद अजय टम्टा भी साक्षी बने। 

सीएम धामी ने मां वाराही देवी की पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना की
प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को शक्तिपीठ मां वाराही देवी की विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की। उन्होंने प्रदेशवासियों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मां वाराही सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें। उन्होंने देवीधुरा की पावन भूमि और विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बगवाल मेले को उत्तराखंड की अगाध आस्था, समृद्ध लोक संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत प्रतीक बताया।

सीएम ने कहा कि मां वाराही मइया सबकी चिंता करती हैं। यह अनूठी विरासत केवल देवीधुरा के बगवाल मैदान में देखने को मिलती है। यहां की परंपरा अनुशासन और भाईचारे की मिसाल है। बगवाल के बाद सभी योद्धा एक-दूसरे के गले मिलते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आधुनिक विकास के साथ सांस्कृतिक जड़ों, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। विकास को केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित न रखते हुए धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि मानसखंड मंदिर माला मिशन के तहत कुमाऊं के प्रमुख धार्मिक स्थलों का कायाकल्प किया जा रहा है। देवीधुरा मंदिर परिसर में 4.27 करोड़ रुपये की लागत से गढ़वाल खाम भवन और 4.57 करोड़ रुपये की लागत से रणकोची मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य चल रहे हैं। घटोत्कच मंदिर के सौंदर्यीकरण, घटकू-हिडिंबा मंदिर निर्माण, सप्तेश्वर महादेव मंदिर में स्नानघाट और लधौनधुरा मेला स्थल के सौंदर्यीकरण के कार्य पूरे हो चुके हैं।

उन्होंने बताया कि घटोत्कच से झालिमाली मंदिर मार्ग के डामरीकरण पर 1.95 करोड़ रुपये, विभिन्न मंदिरों के सौंदर्यीकरण पर 4.70 करोड़ रुपये और पूर्णागिरि मार्ग पर पांच करोड़ रुपये की स्ट्रीट लाइट परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। पाताल रुद्रेश्वर, खेतीखान सूर्य मंदिर, भूमिया देव मंदिर, भिगराड़ा मंदिर और डुंगरी-फत्याल शिव मंदिर से संबंधित विकास कार्य भी गतिमान हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में धार्मिक अवस्थापना और सौंदर्यीकरण के तहत 68.58 करोड़ रुपये की लागत से 397 कार्य कराए गए हैं। इस दौरान मां वाराही मंदिर समिति के अध्यक्ष हीराबल्लभ जोशी, भाजपा जिलाध्यक्ष गोविंद सामंत, दायित्वधारी मुकेश महराना, हुकुम सिंह कुंवर, श्याम नारायण पांडेय, सुभाष बगौली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। संवाद

मुख्यमंत्री धामी बने ऐतिहासिक बगवाल के साक्षी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शुक्रवार को देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में आयोजित ऐतिहासिक बगवाल मेले के साक्षी बने। विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ में आयोजित बगवाल मेले में प्रतिभाग करने के लिए मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से देवीधुरा पहुंचे। हेलीपैड पर कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा, जिलाधिकारी मनीष कुमार, पुलिस अधीक्षक रेखा यादव समेत अन्य जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने मुख्यमंत्री का स्वागत किया। इस दौरान मुख्यमंत्री का पारंपरिक छोलिया नृत्य के साथ स्वागत किया गया। पुलिस बल की ओर से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी, भाजपा जिलाध्यक्ष गोविंद सिंह सामंत, भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता सतीश चंद्र पांडेय समेत अन्य जनप्रतिनिधि भी हेलीपैड पर मौजूद रहे।

यह है बगवाल
मां वाराही धाम देवीधुरा में प्राचीन काल से ही चार खाम सात थोक के द्वारा बगवाल खेलने की परंपरा चली आ रही हैं। मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए नरबलि की परंपरा थी। कहा जाता है कि एक समय चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि देने की बारी आई तो वंश नाश के डर से वृद्धा ने मां वाराही की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर मां वाराही ने चारों खामों के लोगों को एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाकर पूजा करने को कहा। तब से देवीधुरा मंदिर के खोलीखांड दुवाचौड़ मैदान में बगवाल खेलने की परंपरा चली आ रही है। वर्ष 2013 में उच्च न्यायालय ने पत्थरों पर के उपयोग पर रोक लगा दी, इसके बाद से यह परंपरा बदल गई। अब बगवाल वीर नाशपाती, सेब, फूलों से बगवाल खेली जाती है।

चारों खामों में इन गांव के लोग रहे शामिल

- वालिक खाम- वालिक, कलना, दुंठी, मंगललेख तल्ला कांडा, पजेना, डसली, भेटी दियारखोली, सेमलकन्या और धारी का आधा गांव।

- चम्याल खाम- कनवाड़, देवाल, मल्ला कांडा, पारस बटुलिया, बजान, सिंघवाल आदि गांव

- गहड़वाल खाम- ढरोज, कोट भैसर्क, तिमला, कटौली खैरनी, दर्दोली, गंवाई, अनर्पा, बिरोली चमतोल, मोलना, बनोली, कुम्यया कुड़ा, इजट्टा

- लमगड़िया खाम- कोटला, सूफी, मथेलाछाना, बेटचुल, दाड़मि, नरती बेटल, सिलपड़, कोटला

शारीरिक क्षमता और वीरता का प्रतीक हैं एक क्विंटल का भारी पत्थर
देवीधुरा के मां वाराही धाम में युवाओं द्वारा करीब एक क्विंटल (100 किलो) वजन का पत्थर उठाने की परंपरा को शक्ति, साहस और आस्था से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि बगवाल की परंपरा से जुड़े इन पत्थरों को उठाना बगवाली वीरों की शारीरिक क्षमता और वीरता का प्रतीक माना जाता है। युवाओं ने अपनी ताकत और मां वाराही के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए अपना कौशल निकाला। स्थानीय परंपरा में पत्थर और शस्त्र-सदृश वस्तुएं बगवाल की वीर परंपरा से जुड़ी हैं।

सैन्य शक्ति परीक्षण का माध्यम भी बनी बगवाल
मां वाराही धाम देवीधुरा में प्राचीन काल से खेली जाने वाली बगवाल को धर्म और परंपरा से जोड़ कर देखा जाता हैं लेकिन इतिहास के आईने में ज्यादातर जगह इसे सैन्य शक्ति परीक्षण के माध्यम भी माना जाता था।

इतिहासविदों का कहना है कि कत्यूरी, चंद, गोरखा और ब्रिटिशकाल तक कुमाऊं के सारे गांव मारा और फर्त्याल के धड़ों में बंटे थे। बगवाल से एक दिन पहले-पहले कुमाऊं से दोनों धड़ों के लोग मेला स्थल में एकत्रित होते थे। पहले बगवाल सावन में हरेले के दिन खेली जाती थी। जबकि आखिरी बगवाल टिके को होती थी। गुमदेश में चार बूंगा यानी बड़े गांव थे। सिलड और चौपाल के बूंगा मारा धड़ और बसकुनी और न्यौली टुकड़ा फर्त्याल धड़ के कब्जे में थे। अंतिम बगवाल में विजयी होने वाला धड़ साल भर के लिए कुमाऊं, गढ़वाल, डोली आदि इलाकों से कर वसूलने का हकदार हो जाता था। माना जाता है कि इसलिए बगवाल को मारा भी कहा जाता था। महाभारत के अनुसार बगवाल खेलने वाले महर, फर्त्याल, रावत, धौनी, देव, ढेक, खड़ायत, अधिकारी, मेहता, रावल आदि शामिल होते थे।

सड़कों पर पांव रखने की जगह नहीं
मेले के दौरान देवीधुरा की सड़कों पर पांव रखने तक की जगह नहीं थी। हर बार की तरह मेले में वाहनों का लंबा जाम लग रहा। पुलिस ने करीब दो किमी पहले ही वाहन रोक दिए थे। एसपी रेखा यादव के नेतृत्व में चंपावत समेत आसपास के जिलों की पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में लगाई गई थी।

घायल बगवाल वीर वर्ष - समय- योद्धा- दर्शक

2015- 10 मिनट-124- 25- 2016-07 मिनट-59-11-

2017-08 मिनट-11-112 2018-08 मिनट-112-129

2019-09 मिनट-98-24 2020-05 मिनट-3-

2021-08 मिनट-75-2 2022-09 मिनट-201-29

2023-11 मिनट-200-04 2024-11 मिनट-212-

2025-08 मिनट-183-in

 

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