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आंखों में ज्योति नहीं पर दुनिया को दिखाई रोशनी
Updated Sat, 01 Dec 2018 01:47 AM IST
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नैनीताल। कुमाऊं विवि में 36 वर्ष तक सेवा करने के बाद शुक्रवार को सेवानिवृत्त हुए धुनी प्रसाद अपने नाम के अनुरूप आजीवन धुन के पक्के रहे। सिर्फ दो वर्ष की आयु में आंखों की ज्योति गंवाने के बावजूद वे किसी पर बोझ नहीं बने बल्कि अपने पूरे परिवार का सहारा बने।
दो वर्ष की उम्र में धुनी प्रसाद की चेचक से आंखों की रोशनी चली गईं। मूल रूप से उन्नाव यूपी के रहने वाले धुनी ने अपनी लगन से कुर्सी की बुनाई का काम सीखा। उन्होंने टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड पाठ्यक्रम को सुन सुन कर ही कंठस्थ कर लिया और यूपी बोर्ड से हाईस्कूल की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। धुनी बताते हैं कि काफी कठिनाइयों और संघर्ष के बाद 24 वर्ष की आयु में उनका चयन सरकारी सेवा में हो गया और उन्हें कुमाऊं विवि में कुर्सी की बुनाई का कार्य मिला। नौकरी के दौरान उनका विवाह हुआ और दो पुत्र हुए। धुनी ने इस अवधि में विवि, कॉलेज, हॉस्टल आदि में हजारों नई पुरानी कुर्सियां बुनीं। आज जिन बुनाई वाली कुर्सियों में विवि प्रशासनिक भवन और डीएसबी परिसर के अध्यापक, कर्मचारी बैठते हैं वे सारी उनकी ही बुनी हुई हैं। उनको जानने वाले बताते हैं कि वे बहुत ही बेहतरीन बुनाई करते थे और अध्यापकों, कर्मचारियों के घरों में जाकर भी वे यह कार्य कर देते थे। उन्हें पता बता देने पर वे स्वयं ही खोज कर घर पहुंच जाते थे।
आंखों में ज्योति नहीं पर दुनिया को दिखाई रोशनी
कुमाऊं विवि में 36 वर्ष बाद सेवानिवृत्त हुए उन्नाव निवासी
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दो वर्ष की उम्र में धुनी प्रसाद की चेचक से आंखों की रोशनी चली गईं। मूल रूप से उन्नाव यूपी के रहने वाले धुनी ने अपनी लगन से कुर्सी की बुनाई का काम सीखा। उन्होंने टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड पाठ्यक्रम को सुन सुन कर ही कंठस्थ कर लिया और यूपी बोर्ड से हाईस्कूल की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। धुनी बताते हैं कि काफी कठिनाइयों और संघर्ष के बाद 24 वर्ष की आयु में उनका चयन सरकारी सेवा में हो गया और उन्हें कुमाऊं विवि में कुर्सी की बुनाई का कार्य मिला। नौकरी के दौरान उनका विवाह हुआ और दो पुत्र हुए। धुनी ने इस अवधि में विवि, कॉलेज, हॉस्टल आदि में हजारों नई पुरानी कुर्सियां बुनीं। आज जिन बुनाई वाली कुर्सियों में विवि प्रशासनिक भवन और डीएसबी परिसर के अध्यापक, कर्मचारी बैठते हैं वे सारी उनकी ही बुनी हुई हैं। उनको जानने वाले बताते हैं कि वे बहुत ही बेहतरीन बुनाई करते थे और अध्यापकों, कर्मचारियों के घरों में जाकर भी वे यह कार्य कर देते थे। उन्हें पता बता देने पर वे स्वयं ही खोज कर घर पहुंच जाते थे।
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आंखों में ज्योति नहीं पर दुनिया को दिखाई रोशनी
कुमाऊं विवि में 36 वर्ष बाद सेवानिवृत्त हुए उन्नाव निवासी