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20 हजार दुर्लभ पांडुलिपियों को नष्ट होने से बचाया
Updated Sun, 15 Jul 2018 02:02 AM IST
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पुलिस ने भौतिक सत्यापन कर उच्चाधिकारियों को जानकारी दी
- फोटो : अमर उजाला
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नैनीताल। हिमालयन सोसायटी ने समय रहते अभियान चलाकर देश की बहुमूल्य धरोहर कही जाने वाली लगभग 20 हजार पांडुलियों का संरक्षण किया है। संस्था समय रहते पहल न करती तो भारत भर में सैकड़ों पांडुलियों का अस्तित्व ही खत्म हो गया होता। टिहरी गढ़वाल के कलेक्शन में सुशोभित राम चरित मानस की पांडुलिपि के संरक्षण का श्रेय भी हिमालयन सोसायटी को जाता है।
देश में सैकड़ों साल पुरानी लाखों पांडुलिपियां बहुमूल्य ज्ञान के खजाने का भंडार हैं। इनमें मिलने वाली जानकारी अब लाखों करोड़ों रुपये खर्च करके भी हासिल नहीं की जा सकती है। पांडुलिपियों में धर्म, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी अकूत ज्ञान है। प्राचीनकाल में ऋषि मुनियों ने सालों की तपस्या के बाद मानव जीवन को नई सोच और स्फूर्ति देने के तरीके खोजे। यह ज्ञान नष्ट न हो इसलिए उन्होंने इसे पांडुलिपियों के रूप में सुरक्षित कर दिया। ताकि भावी पीढ़ी इसका फायदा उठा सके। इनमें हमारे भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने वाला ज्ञान मौजूद है। लगभग 12 साल पहले हिमालयन सोसायटी ने इसे सहेजने का बीड़ा उठाया। संस्था के निदेशक अनुपम साह बताते हैं कि उन्होंने बड़ी संख्या में लोगों को नैनीताल बुलाकर पांडुलियों का संरक्षण सिखाया। उनकी संस्था के लोग भारत के कोने-कोने में गए और सैकड़ों साल पुरानी पांडुलिपियां सुरक्षित कीं। 16वीं शताब्दी की पांडुलिपि अनवरी सुहायली का संरक्षण उनकी संस्था ने किया। अब वह पांडुलिपि महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी संग्रहालय में सुरक्षित है। इसी तरह उन्होंने बौद्ध धर्म, ज्योतिष विज्ञान, पुराण, इतिहास, गणित, यजुर्वेद आदि से जुड़ी पांडुलिपियों का संरक्षण उस समय किया जब वह नष्ट होने वाली थीं। अगर समय रहते सोसायटी पहल न करती तो आज यह अमूल्य धरोहर नष्ट हो चुकी होती।
नैनीताल की हिमालयन सोसायटी ने उठाया सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का बीड़ा
संस्था पहल न करती तो नष्ट हो जाता नक्षत्र, ज्योतिष, पुराणों, वेदों से संबंधित बहुमूल्य ज्ञान
रामचरित मानस की पांडुलिपि संरक्षण का श्रेय भी हिमालयन सोसायटी को
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देश में सैकड़ों साल पुरानी लाखों पांडुलिपियां बहुमूल्य ज्ञान के खजाने का भंडार हैं। इनमें मिलने वाली जानकारी अब लाखों करोड़ों रुपये खर्च करके भी हासिल नहीं की जा सकती है। पांडुलिपियों में धर्म, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी अकूत ज्ञान है। प्राचीनकाल में ऋषि मुनियों ने सालों की तपस्या के बाद मानव जीवन को नई सोच और स्फूर्ति देने के तरीके खोजे। यह ज्ञान नष्ट न हो इसलिए उन्होंने इसे पांडुलिपियों के रूप में सुरक्षित कर दिया। ताकि भावी पीढ़ी इसका फायदा उठा सके। इनमें हमारे भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने वाला ज्ञान मौजूद है। लगभग 12 साल पहले हिमालयन सोसायटी ने इसे सहेजने का बीड़ा उठाया। संस्था के निदेशक अनुपम साह बताते हैं कि उन्होंने बड़ी संख्या में लोगों को नैनीताल बुलाकर पांडुलियों का संरक्षण सिखाया। उनकी संस्था के लोग भारत के कोने-कोने में गए और सैकड़ों साल पुरानी पांडुलिपियां सुरक्षित कीं। 16वीं शताब्दी की पांडुलिपि अनवरी सुहायली का संरक्षण उनकी संस्था ने किया। अब वह पांडुलिपि महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी संग्रहालय में सुरक्षित है। इसी तरह उन्होंने बौद्ध धर्म, ज्योतिष विज्ञान, पुराण, इतिहास, गणित, यजुर्वेद आदि से जुड़ी पांडुलिपियों का संरक्षण उस समय किया जब वह नष्ट होने वाली थीं। अगर समय रहते सोसायटी पहल न करती तो आज यह अमूल्य धरोहर नष्ट हो चुकी होती।
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नैनीताल की हिमालयन सोसायटी ने उठाया सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का बीड़ा
संस्था पहल न करती तो नष्ट हो जाता नक्षत्र, ज्योतिष, पुराणों, वेदों से संबंधित बहुमूल्य ज्ञान
रामचरित मानस की पांडुलिपि संरक्षण का श्रेय भी हिमालयन सोसायटी को