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कब होगा कण्वाश्रम-सिमलना मार्ग निर्माण का सपना साकार
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फ्वाश्रम-सिमलना पैदल मार्ग, जहां से मोटर मार्ग प्रस्तावित है।
- फोटो : KOTDWAR
आजादी के सात दशक और उत्तराखंड राज्य गठन के 19 साल बाद भी कोटद्वार भाबर से सटी अजमीर पट्टी के वाशिंदों का कण्वाश्रम-पौखाल मोटर मार्ग निर्माण का सपना साकार नहीं हो सका है। यदि सड़क का निर्माण हो जाता तो अजमीर पट्टी के दर्जनों गांवों को यातायात की सुविधा मिलती, वहीं इसका लाभ ऐतिहासिक स्थल कण्वाश्रम को भी मिलता।
आजादी के पहले और इसके काफी साल बाद अस्सी के दशक तक सड़क सुविधा न होने के कारण कण्वाश्रम के चौकीघाटा से पौखाल तक बने पैदल मार्ग पर खूब चहल-पहल हुआ करती थी। पूरे अजमीर पट्टी में कोटद्वार-कलालघाटी-कण्वाश्रम होते हुए आवाजाही और व्यापारिक गतिविधियां चलती थी। इसकी महत्ता को देखते पौड़ी जिला पंचायत ने कण्वाश्रम से मरणखेत-सिमलना होते हुए पौखाल तक छह फुटी पैदल और अश्व मार्ग का निर्माण कराया। आजादी के 70 साल और उत्तराखंड बनने के 19 साल बीत गए, लेकिन क्षेत्रवासियों की इस पैदल मार्ग को मोटर मार्ग में तब्दील करने की मांग पूरी न हो सकी। कण्वाश्रम से सिमलना को जोड़ते हुए करीब दस किमी मोटर मार्ग निर्माण की यह मांग मुख्यमंत्री की घोषणा में भी शामिल है, लेकिन सड़क पर संयुक्त सर्वे से आगे बात नहीं बढ़ सकी।
कण्वाश्रम-पौखाल पैदल मार्ग भी बदहाल
शिक्षाविद् जीएल केष्टवाल, अशोक गौड़, दिनेश गौड़, चंद्रमोहन बिंजोला, श्यामसुंदर कंडवाल का कहना है कि अस्सी के दशक में तत्कालीन पर्वतीय विकास मंत्री चंद्रमोहन सिंह नेगी ने इस संपर्क मार्ग को मोटर मार्ग में तब्दील करने के लिए आधारशिला रखी थी। उत्तराखंड बनने के बाद सरकार ने इस मार्ग की सुध तो ली, लेकिन इसे कण्वाश्रम से शुरू करने के बजाय पौखाल से नीचे की ओर बनाना शुरू कर दिया गया। जिसमें करीब 13 किमी सड़क चूना महेड़ा तक बनकर तैयार हो चुकी है, लेकिन इससे आगे यह कण्वाश्रम तक पहुंचेंगी भी या नहीं कुछ पता नहीं। आज भी क्षेत्रवासी जान जोखिम में डालकर इस मार्ग से आवाजाही कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि सड़क बन जाती तो अजमीर और लंगूर पट्टी के कई गांवों की गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार और भाबर से सड़क दूरी एक तिहाई से भी कम हो जाएगी।
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पौखाल-कण्वाश्रम मार्ग ऊपर से नीचे की ओर करीब साढ़े तेरह किमी बन चुका है। अब कण्वाश्रम से मथाणा की ओर दस किमी मार्ग का संयुक्त सर्वे किया जा रहा है। करीब साढ़े किमी क्षेत्र लैंसडौन वन प्रभाग में जबकि इससे आगे का क्षेत्र सिविल वन में पड़ता है। वन विभाग के साथ संयुक्त सर्वे हो चुका है, अब आगे के लिए राजस्व विभाग के साथ सर्वे प्रस्तावित है। इसके बाद ही वन भूमि हस्तांतरण की पत्रावलियां तैयार की जाएंगी।
-निर्भय सिंह, ईई लोनिवि दुगड्डा।
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आजादी के पहले और इसके काफी साल बाद अस्सी के दशक तक सड़क सुविधा न होने के कारण कण्वाश्रम के चौकीघाटा से पौखाल तक बने पैदल मार्ग पर खूब चहल-पहल हुआ करती थी। पूरे अजमीर पट्टी में कोटद्वार-कलालघाटी-कण्वाश्रम होते हुए आवाजाही और व्यापारिक गतिविधियां चलती थी। इसकी महत्ता को देखते पौड़ी जिला पंचायत ने कण्वाश्रम से मरणखेत-सिमलना होते हुए पौखाल तक छह फुटी पैदल और अश्व मार्ग का निर्माण कराया। आजादी के 70 साल और उत्तराखंड बनने के 19 साल बीत गए, लेकिन क्षेत्रवासियों की इस पैदल मार्ग को मोटर मार्ग में तब्दील करने की मांग पूरी न हो सकी। कण्वाश्रम से सिमलना को जोड़ते हुए करीब दस किमी मोटर मार्ग निर्माण की यह मांग मुख्यमंत्री की घोषणा में भी शामिल है, लेकिन सड़क पर संयुक्त सर्वे से आगे बात नहीं बढ़ सकी।
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कण्वाश्रम-पौखाल पैदल मार्ग भी बदहाल
शिक्षाविद् जीएल केष्टवाल, अशोक गौड़, दिनेश गौड़, चंद्रमोहन बिंजोला, श्यामसुंदर कंडवाल का कहना है कि अस्सी के दशक में तत्कालीन पर्वतीय विकास मंत्री चंद्रमोहन सिंह नेगी ने इस संपर्क मार्ग को मोटर मार्ग में तब्दील करने के लिए आधारशिला रखी थी। उत्तराखंड बनने के बाद सरकार ने इस मार्ग की सुध तो ली, लेकिन इसे कण्वाश्रम से शुरू करने के बजाय पौखाल से नीचे की ओर बनाना शुरू कर दिया गया। जिसमें करीब 13 किमी सड़क चूना महेड़ा तक बनकर तैयार हो चुकी है, लेकिन इससे आगे यह कण्वाश्रम तक पहुंचेंगी भी या नहीं कुछ पता नहीं। आज भी क्षेत्रवासी जान जोखिम में डालकर इस मार्ग से आवाजाही कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि सड़क बन जाती तो अजमीर और लंगूर पट्टी के कई गांवों की गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार और भाबर से सड़क दूरी एक तिहाई से भी कम हो जाएगी।
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पौखाल-कण्वाश्रम मार्ग ऊपर से नीचे की ओर करीब साढ़े तेरह किमी बन चुका है। अब कण्वाश्रम से मथाणा की ओर दस किमी मार्ग का संयुक्त सर्वे किया जा रहा है। करीब साढ़े किमी क्षेत्र लैंसडौन वन प्रभाग में जबकि इससे आगे का क्षेत्र सिविल वन में पड़ता है। वन विभाग के साथ संयुक्त सर्वे हो चुका है, अब आगे के लिए राजस्व विभाग के साथ सर्वे प्रस्तावित है। इसके बाद ही वन भूमि हस्तांतरण की पत्रावलियां तैयार की जाएंगी।
-निर्भय सिंह, ईई लोनिवि दुगड्डा।