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घोषणाओं के बाद भी नहीं सुधरी बांस केंद्र की दशा
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बांस एवं रामबांस श्रेष्ठता प्रचार-प्रसार केंद्र की दशा सुधारने के लिए चार वर्षों में कई घोषणाएं र्हुइं, लेकिन अभी तक एक भी घोषणा धरातल पर नहीं उतर सकी है। ऐसे में केंद्र बदहाल बना हुआ है। स्थिति यह है कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं भी अब यहां ट्रेनिंग लेने से कतराने लगी हैं।
उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद की ओर से वर्ष 2005 में स्थापित इस केंद्र में इन दिनों करीब 15 लाख रुपये की लागत की मशीनें धूल फांक रही हैं। इस केंद्र का उद्देश्य था कि बांस के माध्यम से बेरोजगारों को रोजगार मिल सके, लेकिन परिषद के अधिकारियों की उदासीनता के चलते बांस केंद्र में अब एक ही व्यक्ति ट्रेनर रह गया है। जबकि शुरुआती दौर में यहां लगभग 30 लोग काम करते थे। इसके अलावा यहां लोगों को कुर्सी, मेज, टेबिल लैंप, अलमारी आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था जिससे उन्हें रोजगार के साथ मानदेय भी मिलता था, लेकिन वर्तमान में कम मानदेय देने के कारण केंद्र में प्रशिक्षण लेने वालों का भी टोटा बना हुआ है।
ये हुई घोषणाएं
वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने वर्ष 2018 में इस केंद्र को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने श्रम मंत्रालय, वन विभाग और सेवायोजन विभाग से इस केंद्र को मदद देने का भी भरोसा दिया था। वर्ष 2019 में प्रदेश सरकार ने वन अधिनियम में संशोधन कर जहां बांस को पेड़ की श्रेणी से अलग कर बांस की खेती और खरीदने-बेचने का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं नेशनल बैंबो मिशन के तहत कोटद्वार केंद्र को बांस की मंडी और बांस ज्वेलरी की फैक्ट्री स्थापित करने के लिए 14 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई। वन अधिनियम 1927 में संशोधन के बाद राज्य सरकार ने भी बांस उत्पादन को उद्योग का दर्जा दे दिया, लेकिन घोषणाएं अभी तक धरातल पर नहीं उतर सकी है।
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यह है वर्तमान में स्थिति
वर्तमान में स्थिति यह है कि श्रम विभाग और ब्लाक कार्यालय में समूह का रजिस्ट्रेशन नहीं हो पा रहा है। रजिस्ट्रेशन के अभाव में समूह का लाभ भी महिलाओं को नहीं मिल रहा है। विभाग की ओर से 8 हजार मानदेय के स्थान पर प्रशिक्षणार्थियों को प्रति उत्पाद के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है, जिससे प्रशिक्षार्थियों का ट्रेनिंग से मोह भंग हो रहा है। वर्तमान में केंद्र में महज 15 प्रशिक्षणार्थी ही रह गए हैं। गोदाम के अभाव में केंद्र में विपणन के लिए रखा बैंबो बांस भी बरसात में खराब हो रहा है।
ट्रेनिंग सेंटर के रूप में केंद्र पहले से ही कार्य कर रहा है। विभाग की ओर से कई योजनाएं तैयार कर स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को भेजी गई हैं। जल्द ही केंद्र में गोदाम तैयार किया जाएगा। मैदानी जनपदों के साथ ही पर्वतीय क्षेत्र में करीब नापखेत और वन पंचायतों में करीब 500 एकड़ पर बांस का रोपण किया गया है। भविष्य में प्राइवेट में अल्प मानदेय में काम कर रहे लोगों को ट्रेनिंग देकर स्वरोजगार से जोड़ा जाएगा। - दिनेश जोशी प्रोग्राम मैनेजर, बांस रेशा परिषद उत्तराखंड।
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उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद की ओर से वर्ष 2005 में स्थापित इस केंद्र में इन दिनों करीब 15 लाख रुपये की लागत की मशीनें धूल फांक रही हैं। इस केंद्र का उद्देश्य था कि बांस के माध्यम से बेरोजगारों को रोजगार मिल सके, लेकिन परिषद के अधिकारियों की उदासीनता के चलते बांस केंद्र में अब एक ही व्यक्ति ट्रेनर रह गया है। जबकि शुरुआती दौर में यहां लगभग 30 लोग काम करते थे। इसके अलावा यहां लोगों को कुर्सी, मेज, टेबिल लैंप, अलमारी आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था जिससे उन्हें रोजगार के साथ मानदेय भी मिलता था, लेकिन वर्तमान में कम मानदेय देने के कारण केंद्र में प्रशिक्षण लेने वालों का भी टोटा बना हुआ है।
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ये हुई घोषणाएं
वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने वर्ष 2018 में इस केंद्र को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने श्रम मंत्रालय, वन विभाग और सेवायोजन विभाग से इस केंद्र को मदद देने का भी भरोसा दिया था। वर्ष 2019 में प्रदेश सरकार ने वन अधिनियम में संशोधन कर जहां बांस को पेड़ की श्रेणी से अलग कर बांस की खेती और खरीदने-बेचने का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं नेशनल बैंबो मिशन के तहत कोटद्वार केंद्र को बांस की मंडी और बांस ज्वेलरी की फैक्ट्री स्थापित करने के लिए 14 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई। वन अधिनियम 1927 में संशोधन के बाद राज्य सरकार ने भी बांस उत्पादन को उद्योग का दर्जा दे दिया, लेकिन घोषणाएं अभी तक धरातल पर नहीं उतर सकी है।
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यह है वर्तमान में स्थिति
वर्तमान में स्थिति यह है कि श्रम विभाग और ब्लाक कार्यालय में समूह का रजिस्ट्रेशन नहीं हो पा रहा है। रजिस्ट्रेशन के अभाव में समूह का लाभ भी महिलाओं को नहीं मिल रहा है। विभाग की ओर से 8 हजार मानदेय के स्थान पर प्रशिक्षणार्थियों को प्रति उत्पाद के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है, जिससे प्रशिक्षार्थियों का ट्रेनिंग से मोह भंग हो रहा है। वर्तमान में केंद्र में महज 15 प्रशिक्षणार्थी ही रह गए हैं। गोदाम के अभाव में केंद्र में विपणन के लिए रखा बैंबो बांस भी बरसात में खराब हो रहा है।
ट्रेनिंग सेंटर के रूप में केंद्र पहले से ही कार्य कर रहा है। विभाग की ओर से कई योजनाएं तैयार कर स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को भेजी गई हैं। जल्द ही केंद्र में गोदाम तैयार किया जाएगा। मैदानी जनपदों के साथ ही पर्वतीय क्षेत्र में करीब नापखेत और वन पंचायतों में करीब 500 एकड़ पर बांस का रोपण किया गया है। भविष्य में प्राइवेट में अल्प मानदेय में काम कर रहे लोगों को ट्रेनिंग देकर स्वरोजगार से जोड़ा जाएगा। - दिनेश जोशी प्रोग्राम मैनेजर, बांस रेशा परिषद उत्तराखंड।