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बूंगी कौथिक के गवाह बनेंगे हजारों भक्त
Updated Thu, 08 Feb 2018 10:48 PM IST
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कोटद्वार। 16 अप्रैल (तीन गते बैशाख) को लगने वाले बूंगी कौथिग में इस साल लोकगायक किशन महिपाल और साथी हल्दूखाल में प्रस्तुति देंगे। बूंगी देवी कौथिक की तैयारियां शुरू हो गई हैं। बूंगी पट्टी और आसपास के लोगों की आराध्य देवी हैं। हर साल की तरह इस बार भी हजारों लोग कौथिक पहुंचकर देवी का आशीर्वाद लेंगे।
बूंगी देवी मंदिर देवीडांडा पर्वत पर समुद्र तल से लगभग 1398 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर की स्थापना वीरांगना तीलू रौतेली ने सन 1677 के आसपास कत्यूरों पर विजय के उपलक्ष्य में की। तीलू रौतेली ने कत्यूरों के विरुद्ध अभियान की शुरुआत खैरागढ़ से की, जोकि वर्तमान कालागढ़ के समीप है। खैरागढ़ में कत्यूरों को हराने के बाद तीलू रौतेली ने टकोलीखाल में कत्यूरों को हराया। इस विजय के उपलक्ष्य में तीलू रौतेली ने बूंगी देवी मंदिर का निर्माण करवाया।
बूंगी देवी मंदिर के पुजारी सुंदोली के गौड़ ब्राह्मण हैं। बूंगी देवी मंदिर में हर वर्ष तीन गते वैशाख को भव्य मेला लगता है। बूंगी देवी मंदिर के बारे में कई किवदंतियां प्रचलित हैं। बूंगी देवी को भौंन देवी की बहन भी बोला जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार बूंगी देवी से मंदाल नदी तक एक गुफा है। इसके माध्यम से बूंगी देवी नहाने जाती हैं। मंदाल नदी में उस स्थान को देवी रौ के नाम से जाना जाता है, जहां पर बूंगी देवी स्नान करती हैं। लंबे समय से बूंगी पट्टी की लड़कियों द्वारा बूंगी देवी मंदिर में शादी के बाद कम से कम एक बार बकरे की बलि देने का रिवाज है। बूंगी देवी मंदिर जाने के लिए निकटस्थ स्थान हल्दूखाल है, जो कि सड़क मार्ग से कोटद्वार और रामनगर दोनों जगहों से जुड़ा हुआ है। हल्दूखाल से बूंगी देवी मंदिर के लिए बियासी गांव होते हुए लगभग देवीडांड पर डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई है। इस रास्ते में आग्नेय चट्टानें हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में कुड़या ढुंग भी कहा जाता है। हाथीढुंग भी इसी प्रकार की एक चट्टान है, जो कि बियासी गांव से ऊपर है।
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बूंगी देवी मंदिर देवीडांडा पर्वत पर समुद्र तल से लगभग 1398 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर की स्थापना वीरांगना तीलू रौतेली ने सन 1677 के आसपास कत्यूरों पर विजय के उपलक्ष्य में की। तीलू रौतेली ने कत्यूरों के विरुद्ध अभियान की शुरुआत खैरागढ़ से की, जोकि वर्तमान कालागढ़ के समीप है। खैरागढ़ में कत्यूरों को हराने के बाद तीलू रौतेली ने टकोलीखाल में कत्यूरों को हराया। इस विजय के उपलक्ष्य में तीलू रौतेली ने बूंगी देवी मंदिर का निर्माण करवाया।
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बूंगी देवी मंदिर के पुजारी सुंदोली के गौड़ ब्राह्मण हैं। बूंगी देवी मंदिर में हर वर्ष तीन गते वैशाख को भव्य मेला लगता है। बूंगी देवी मंदिर के बारे में कई किवदंतियां प्रचलित हैं। बूंगी देवी को भौंन देवी की बहन भी बोला जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार बूंगी देवी से मंदाल नदी तक एक गुफा है। इसके माध्यम से बूंगी देवी नहाने जाती हैं। मंदाल नदी में उस स्थान को देवी रौ के नाम से जाना जाता है, जहां पर बूंगी देवी स्नान करती हैं। लंबे समय से बूंगी पट्टी की लड़कियों द्वारा बूंगी देवी मंदिर में शादी के बाद कम से कम एक बार बकरे की बलि देने का रिवाज है। बूंगी देवी मंदिर जाने के लिए निकटस्थ स्थान हल्दूखाल है, जो कि सड़क मार्ग से कोटद्वार और रामनगर दोनों जगहों से जुड़ा हुआ है। हल्दूखाल से बूंगी देवी मंदिर के लिए बियासी गांव होते हुए लगभग देवीडांड पर डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई है। इस रास्ते में आग्नेय चट्टानें हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में कुड़या ढुंग भी कहा जाता है। हाथीढुंग भी इसी प्रकार की एक चट्टान है, जो कि बियासी गांव से ऊपर है।
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