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आंखों में आंसू, मुंह से नहीं निकले शब्द
ब्यूरो, अमर उजाला/रुड़की
Updated Sat, 11 Jul 2015 02:30 AM IST
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आईआईटी की सीनेट की बैठक के 48 घंटे के बाद शुक्रवार की रात आठ बजे जैसे ही यह फैसला आया कि उनके लाड़लों को संस्थान से बाहर निकाल दिया गया है। वहां मौजूद अभिभावकों के बुझे दिलों पर एकाएक पहाड़ टूट पड़ा। अभिभावक फैसले से हतप्रभ थे।
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उन्हें उम्मीद थी कि सीनेट के बाद एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक बुलाई है तो जरूर उन्हें राहत मिलेगी, लेकिन अभिभावकों की भावनाओं पर कमेटी का फैसला भारी पड़ा। सभी की आंखों में आंसू थे और मुंह से शब्द जैसे किसी ने छीन लिए थे।
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आईआईटी के 73 छात्रों को कम सीजीपीए के चलते बाहर निकाले जाने का फैसला आठ जून को सीनेट की बैठक में रात करीब सात बजे सुनाया गया था। इसके बाद संस्थान प्रशासन ने अभिभावकों को जब यह आश्वासन दिया कि सीनेट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए 10 जून की शाम को एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक बुलाई गई है तो अभिभावकों को उम्मीद थी कि वे किसी तरह अपने बच्चों के भविष्य को बचा लेंगे।
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इस उम्मीद के सहारे अभिभावक संस्थान में भूखे प्यासे और दुखी मन से अंतिम फैसले का इंतजार करते रहे। शुक्रवार को बैठक साढ़े चार बजे शुरू हुई। तब से अभिभावकों की निगाह मुख्य भवन से आने वाले फैसले पर टिकी रही। अभिभावकों का कहना था कि कम नंबर आने पर उन्हें इतनी बड़ी सजा न दी जाए।
बस, एक मौका दिया जाए लेकिन इस बैठक के बाद भी छात्रों और अभिभावकों को कोई राहत नहीं मिली।
आईआईटी में आने के बाद से है मानसिक रूप से पीड़ित
मानसिक रूप से बीमार चल रहे पीयूष गर्ग ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में आल इंडिया 1641 रैंक हासिल की थी। उसकी बीमारी की चलते मां राजकुमारी भी छात्र के साथ हॉस्टल में रहती थी। दुखद स्थिति तो यह थी कि अपने बेटे को परीक्षा दिलाने पहुंची मां को यहां आकर पता चला कि उसके बेटे को संस्थान से बाहर निकाल दिया गया है।
ऐसा नहीं है कि इस फैसले से पढ़ाई में कमजोर छात्रों का भविष्य अंधकार में आ गया है। बल्कि इनमें ऐसे कई छात्र है जो अपनी मेधा के बल पर आईआईटी में प्रवेश पाए हैं। इनमें से राजस्थान के करोली जिले के कोटरा हिंडोल निवासी पीयूष गर्ग भी एक हैं। पीयूष ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में आल इंडिया 1641 रैंक पाई थी।
यही नहीं पीयूष ने आईआईटी की तैयारी के लिए राजस्थान के कोटा क्लासेज की परीक्षा में अच्छे अंक लाने पर उसे 90 प्रतिशत फीस में छूट दी गई थी, लेकिन इस मेधावी छात्र को भी संस्थान तराश नहीं पाया। इसके बाद स्थिति उस समय विकट हो गई जब संस्थान में आने के बाद पीयूष मानसिक बीमारी से पीड़ित हो गया।
उसकी देखभाल के मां राजकुमारी भी अपने पूरे परिवार को छोड़कर उसका साथ देने के लिए संस्थान में आकर रहने लगी। उसका यहां आईआईटी के अस्पताल में मनोचिकित्सक से इलाज शुरू कराया और मेडिकल सर्टिफिकेट भी संस्थान में दाखिल कराया। राजकुमारी ने बताया कि उन्हें तो यह पता ही नहीं था कि उसके बेटे को संस्थान से बाहर निकाल दिया गया है।
वह तो अपने बेटे को तृतीय सेमेस्टर की परीक्षा दिलाने के लिए यहां आई थी। मां राजकुमारी का कहना था कि उसका बेटा किसी बात में कम नहीं है फिर उसे और उसके बेटे को किस बात की सजा दी जा रही है। उसका सवाल था कि आईआईटी के किसी अधिकारी के पास पिता का दिल नहीं है।
जानबूझकर देर से भेजा पत्र
अभिभावकों का आरोप था कि हाईटेक माने जाने वाली आईआईटी की ओर से 24 जून को जारी पत्र उन्हें पांच जुलाई के बाद मिला। जयपुर निवासी एक अभिभावक का कहना था कि सामान्य तौर पर डाक से तीन से चार दिन में पत्र मिल जाना चाहिए था लेकिन संस्थान प्रशासन ने जानबूझकर उन्हें छात्रों को बाहर निकाले जाने की सूचना समय से नहीं दी। समय से सूचना मिलने के कारण ही छात्र फैसले की अंतिम घड़ी तक संस्थान में पहुंच पाए।