{"_id":"5ad395774f1c1b58098b4b8d","slug":"61523815799-haridwar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पितृ अमावस्या पर हजारों ने किया श्राद्ध तर्पण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पितृ अमावस्या पर हजारों ने किया श्राद्ध तर्पण
Updated Sun, 15 Apr 2018 11:39 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरिद्वार। पितृ अमावस्या पर देश के विभिन्न भागों से आए श्रद्धालु ने पितरों के निमित्त श्राद्ध तपर्ण किया। श्राद्ध के स्थल कुशावर्त घाट और नारयणी शिला पर खासी संख्या में श्रद्धालु जुटे।
अमावस्या तिथि रविवार को सुबह 8.38 बजे लगने से पितृ अमावस्या सोमवती के एक दिन पहले पड़ गई। जिन तीर्थ यात्रियों को सोमवती स्नान से पूर्व पितृ तपर्ण करना था, उन्होंने आज पितरों के लिए जल दान किया। स्नानार्थियों ने गंगा स्नान के उपरांत नियत घाटों पर पहुंचकर पितृ शांति, पितृ दोष निवारण, काल सर्प निवारण, पंचक निवारण और नारायणी प्रेत कर्म संपन्न कराए। मान्यता है कि कुशावर्त भगवान दत्तात्रेय की तपस्थली है। इस स्थान पर दत्तात्रेय ने एक पांव पर खड़े होकर हजारों वर्ष तप किया था। लाखों वर्ष पूर्व जब गंगा मैया धरती पर आई तब भी दत्तात्रेय मौजूद थे। उन्हीं के चरण पखारते हुए गंगा आगे बढ़ी थी। तभी से इस स्थान को पितृ कर्मकांड और देव कर्मकांड दोनों के लिए मान्य किया गया। इस स्थल पर भगवान राम ने भी सीता के साथ आकर पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। इस स्थान पर पितृ कर्मकांड करने से पितरों की मुक्ति हो जाती है। इस घाट यज्ञोपवीत, मुंडन आदि संस्कार भी उत्तरायण में कराए जाते हैं। इस प्रकार नारायणी शिला का महत्व गया के समान है। यहां भगवान नारायण का पत्थर से बना भाग भी मौजूद है। नारायणी शिला पर पितृ कर्म करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है।
भारी महत्व के चलते प्रत्येक यहां दोनों घाटों पर श्राद्ध कर्म होते है। अमावस्या पर पितृ दोष निर्वारण के लिए श्रद्धालु हजारों की संख्या में इस घाटों पर पहुंचे है। आज अमावस्या का श्राद्ध काल पड़ने से श्राद्ध संपन्न हुए। सोमवार को अब सोमवती का स्नान होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
अमावस्या तिथि रविवार को सुबह 8.38 बजे लगने से पितृ अमावस्या सोमवती के एक दिन पहले पड़ गई। जिन तीर्थ यात्रियों को सोमवती स्नान से पूर्व पितृ तपर्ण करना था, उन्होंने आज पितरों के लिए जल दान किया। स्नानार्थियों ने गंगा स्नान के उपरांत नियत घाटों पर पहुंचकर पितृ शांति, पितृ दोष निवारण, काल सर्प निवारण, पंचक निवारण और नारायणी प्रेत कर्म संपन्न कराए। मान्यता है कि कुशावर्त भगवान दत्तात्रेय की तपस्थली है। इस स्थान पर दत्तात्रेय ने एक पांव पर खड़े होकर हजारों वर्ष तप किया था। लाखों वर्ष पूर्व जब गंगा मैया धरती पर आई तब भी दत्तात्रेय मौजूद थे। उन्हीं के चरण पखारते हुए गंगा आगे बढ़ी थी। तभी से इस स्थान को पितृ कर्मकांड और देव कर्मकांड दोनों के लिए मान्य किया गया। इस स्थल पर भगवान राम ने भी सीता के साथ आकर पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। इस स्थान पर पितृ कर्मकांड करने से पितरों की मुक्ति हो जाती है। इस घाट यज्ञोपवीत, मुंडन आदि संस्कार भी उत्तरायण में कराए जाते हैं। इस प्रकार नारायणी शिला का महत्व गया के समान है। यहां भगवान नारायण का पत्थर से बना भाग भी मौजूद है। नारायणी शिला पर पितृ कर्म करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है।
विज्ञापन
भारी महत्व के चलते प्रत्येक यहां दोनों घाटों पर श्राद्ध कर्म होते है। अमावस्या पर पितृ दोष निर्वारण के लिए श्रद्धालु हजारों की संख्या में इस घाटों पर पहुंचे है। आज अमावस्या का श्राद्ध काल पड़ने से श्राद्ध संपन्न हुए। सोमवार को अब सोमवती का स्नान होगा।
विज्ञापन