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लोभ मोह से मुक्ति दिलाती है साधना: डॉ. पंड्या
Updated Thu, 22 Mar 2018 09:59 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि नियमित रूप से की गई साधना साधक को लोभ, मोह-माया, लालच से मुक्ति दिलाती है। साथ ही एकाग्रता और शांति देने में भी सहायक है। कही।
नवरात्र साधना में जुटे विवि के युवाओं की विशेष कक्षा में कुलाधिपति डा. पंड्या ने कहा कि लालच एक ऐसी बीमारी है, जो मनुष्य को गर्त में धकेल देती है। भाई-भाई में वैचारिक द्वंद्व पैदा करता है। लालच मोह को जन्म देता है और मोह आसक्ति को। उन्होंने कहा कि इन सबसे बचने के लिए नियमित रूप से सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री मां गायत्री की साधना एवं अच्छे साहित्यों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
षट् संपति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उपरति एक ऐसी संपत्ति है, जो सांसारिक माया मोह सें अनासक्ति पैदा कर साधक को साधना के उच्चतम स्तर पर ले जाती है। कहा कि उपरति के लिए अपरिग्रह और निर्लोभता के गुणों का विकसित होना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि साधक तप के बल पर अपनी चेतना का विकास करता है, जिससे उसके मन में संसार रूपी माया और मोह के लिए भोग और द्वेष बुद्धि समाप्त हो जाती है। संगीत विभाग की ओर से बांसुरी व सितार की धुन पर ‘मां इतनी कृपा कर दें....’ गीत से साधकों ने भक्ति भाव में गोता लगाया। सत्संग के समापन पर रामचरित मानस की आरती ने आनंदित कर दिया।
हरिद्वार।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि नियमित रूप से की गई साधना साधक को लोभ, मोह-माया, लालच से मुक्ति दिलाती है। साथ ही एकाग्रता और शांति देने में भी सहायक है। कही।
नवरात्र साधना में जुटे विवि के युवाओं की विशेष कक्षा में कुलाधिपति डा. पंड्या ने कहा कि लालच एक ऐसी बीमारी है, जो मनुष्य को गर्त में धकेल देती है। भाई-भाई में वैचारिक द्वंद्व पैदा करता है। लालच मोह को जन्म देता है और मोह आसक्ति को। उन्होंने कहा कि इन सबसे बचने के लिए नियमित रूप से सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री मां गायत्री की साधना एवं अच्छे साहित्यों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
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षट् संपति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उपरति एक ऐसी संपत्ति है, जो सांसारिक माया मोह सें अनासक्ति पैदा कर साधक को साधना के उच्चतम स्तर पर ले जाती है। कहा कि उपरति के लिए अपरिग्रह और निर्लोभता के गुणों का विकसित होना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि साधक तप के बल पर अपनी चेतना का विकास करता है, जिससे उसके मन में संसार रूपी माया और मोह के लिए भोग और द्वेष बुद्धि समाप्त हो जाती है। संगीत विभाग की ओर से बांसुरी व सितार की धुन पर ‘मां इतनी कृपा कर दें....’ गीत से साधकों ने भक्ति भाव में गोता लगाया। सत्संग के समापन पर रामचरित मानस की आरती ने आनंदित कर दिया।
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