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बेलगाम भीड़ ने नेताओं के भी उड़ाए होश
Updated Tue, 03 Apr 2018 11:00 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
एससीएसटी एक्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के विरोध में सोमवार को दलित समाज के उग्र प्रदर्शन के दौरान बेलगाम भीड़ उमड़ने से राजनीतिक दलों की भी नींद उड़ी हुई है। राजनीतिक हलकों के लोग अपने- अपने हिसाब से इस भीड़ की एकजुटता के लाभ और हानि के जोड़ घटाव में जुटे रहे। हालांकि दलित आंदोलन से जुड़े नेता इसे पूरी तरह गैर राजनीतिक आंदोलन बता रहे हैं परंतु भीड़ की एकजुटता का चुनावी राजनीति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
सोमवार को हुआ प्रदर्शन कई मायनों में लोगों के जेहन पर अपनी छाप छोड़ गया। इस भीड़ में शामिल अधिकतर युवा थे। अब इस एकजुटता पर राजनीतिक विश्लेषकों की भी नजर पड़ने लगी है। दिनभर इसका भविष्य की राजनीति के नजरिये से विश्लेषण किया जाता रहा।
कुछ लोगों का मानना है कि पूरा आंदोलन कुछ राजनीतिक लोगों की ओर से नियोजित तरीके से कराया गया। इसके पीछे वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा के चुनावों की रणनीति है। जबकि कुछ लोग इसे बसपा में दोबारा से जान फूंकने का प्रयास मान रहे हैं। कोई इसे मोदी सरकार के खिलाफ तो कोई पक्ष में बता रहा है। सबकी राय है कि आसन्न निकाय चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनाव पर इसका असर पड़ना तय है। दलित आंदोलन से जुड़े कांग्रेस नेता तीरथपाल रवि का कहना है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तरह से युवाओं से वादा किया था उसे पूरा करने में वह विफल रही है। आज वही युवा वर्ग निराश होकर सड़कों पर उतरा है। इसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर भाजपा के दलित नेता जगजीवनराम का कहना है कि इस आंदोलन को राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह समाज के सम्मान और अधिकार का मामला है। राजनीतिक रूप से भाजपा ने दलितों को हर स्तर पर सम्मान दिया है।
हरिद्वार।
एससीएसटी एक्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के विरोध में सोमवार को दलित समाज के उग्र प्रदर्शन के दौरान बेलगाम भीड़ उमड़ने से राजनीतिक दलों की भी नींद उड़ी हुई है। राजनीतिक हलकों के लोग अपने- अपने हिसाब से इस भीड़ की एकजुटता के लाभ और हानि के जोड़ घटाव में जुटे रहे। हालांकि दलित आंदोलन से जुड़े नेता इसे पूरी तरह गैर राजनीतिक आंदोलन बता रहे हैं परंतु भीड़ की एकजुटता का चुनावी राजनीति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
सोमवार को हुआ प्रदर्शन कई मायनों में लोगों के जेहन पर अपनी छाप छोड़ गया। इस भीड़ में शामिल अधिकतर युवा थे। अब इस एकजुटता पर राजनीतिक विश्लेषकों की भी नजर पड़ने लगी है। दिनभर इसका भविष्य की राजनीति के नजरिये से विश्लेषण किया जाता रहा।
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कुछ लोगों का मानना है कि पूरा आंदोलन कुछ राजनीतिक लोगों की ओर से नियोजित तरीके से कराया गया। इसके पीछे वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा के चुनावों की रणनीति है। जबकि कुछ लोग इसे बसपा में दोबारा से जान फूंकने का प्रयास मान रहे हैं। कोई इसे मोदी सरकार के खिलाफ तो कोई पक्ष में बता रहा है। सबकी राय है कि आसन्न निकाय चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनाव पर इसका असर पड़ना तय है। दलित आंदोलन से जुड़े कांग्रेस नेता तीरथपाल रवि का कहना है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तरह से युवाओं से वादा किया था उसे पूरा करने में वह विफल रही है। आज वही युवा वर्ग निराश होकर सड़कों पर उतरा है। इसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर भाजपा के दलित नेता जगजीवनराम का कहना है कि इस आंदोलन को राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह समाज के सम्मान और अधिकार का मामला है। राजनीतिक रूप से भाजपा ने दलितों को हर स्तर पर सम्मान दिया है।
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