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क्या पुनर्निर्माण की कसौटी पर खरी उतरेगी सरकार

Sat, 29 Jun 2013 01:17 PM IST
देहरादून/ब्यूरो
देहरादून/ब्यूरो Updated Sat, 29 Jun 2013 01:17 PM IST
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government has big challenge to reconstruction  destroyed disaster area

दैवी आपदा के बाद राहत कार्यों में लचर व्यवस्था के लिए बदनाम हुई राज्य सरकार के लिए अब पुनर्निर्माण की कसौटी पर खरा उतरना किसी बडी चुनौती से कम नहीं होगा। रेस्क्यू अंतिम पड़ाव की ओर है लेकिन आपदा का दंश झेल रहे सैकड़ों गांवों में राहत सामग्री का सही ढंग से सही हाथों में वितरण करने की डगर भी सरकार के लिए कम मुश्किलों भ्ारी नहीं है।

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मगर सबसे मुश्किल काम परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण का है। अभी तक आधे विभागों के पास तो अपने नुकसान का ब्योरा भी नहीं है। करीब ढाई हजार करोड़ की लागत से पूरे होने वाले इस कार्य में डेढ़ से दो साल का समय लगना स्वाभाविक है। हालांकि सरकार तंत्र अभी पड़ताल में ही उलझा है, लेकिन प्रदेश में ऐसे 200 से ज्यादा गांव हैं जिनके संपर्क मार्ग और पुल बह गए हैं।
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जिस हिसाब से नुकसान हुआ है उसके मद्देनजर क्षतिग्रस्त परिसंपत्तियों की मरम्मत करने और सड़कें बनाने में ही दो वर्ष का समय लगना है। वैसे भी सरकार के पास जो उपकरण्ा, मशीनें और मानव संसाधन है, उन्हें सरकार की वार्षिक योजना का पैसा खर्च करने में ही पसीना आ जाता है।
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ऐसे में ढाई हजार करोड़ के अतिरिक्त कार्यों को समेटने के लिए सरकार के पास कौन सा फार्मूला है, इसे देखने के लिए अभी इंतजार ही करना होगा। सरकार के पास ऐसा कोई फार्मूला या आधुनिक यंत्रों के साथ बड़ी संख्या में एक्सपर्ट्स भी नहीं है जो इस काम को साल छह महीने में कर डाले।

दो साल का समय लगना इसलिए भी व्यवहारिक है, क्योंकि इस समय मानसून की आमद हो चुकी है। सितम्बर तक काम की गति बरसात के ऊपर निर्भर करेगी। टूटी सड़कें निर्माण के लिए पहाड़ पर मैटिरीयल ले जाने के लिए सबसे बड़ी बाधा बनेगी।

सितम्बर माह पूरा होगा तो केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री में प्रचंड ठंड़ और उसके साथ बर्फबारी काम में बाधा बनेगी। समय बीतेगा तो जनवरी मध्य से अप्रैल-मई तक का समय मिलेगा।

इसके बाद जून में मानसून की आमद हो जाती है। इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोगों को राहत देने के बाद परिसंपत्तियों के नुकसान को पूरा करने के लिए कौन सा मैकेनिज्म होगा।

चुनौती और प्रारंभिक एस्टीमेट
- मंदिर समिति की रामबाड़ा व गौरीकुंड में 22 और अन्य स्थानों पर दर्जन भर धर्मशालाएं नष्ट हो गई। पुजारी व कर्मियों की आवासीय कालोनी का नामो निशान नहीं बचा। करीब 200 करोड़ रुपए की जरूरत है।
- पीडब्लूडी, पीएमजीएसवाई की 802 सड़कें टूटी है। प्रारंभिक तौर पर करीब 560 करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन तैयार हुआ है।
- किसानों की खेती बाड़ी के लिए बनाई गई गूल व लघु सिंचाई की 1753 परियोजनाएं नष्ट हो गई है। तत्काल 53.56 करोड़ की दरकार है।
- दैवी आपदा में प्राथमिक विद्यालयों से लेकर इंटर कॉलेज तक क्षतिग्रस्त होने वाले भवनों की संख्या 90 हैं। कुछ आंशिक कुछ अधिकांशत: क्षति वाले हैं। इनके लिए 7.9 करोड़ रुपए चाहिए।

- जल विद्युत निगम में डेढ़ सौ करोड़ और पावर कारपोरेशन में लगभग पचास करोड़ के नुकसान का आकलन हुआ है। मनेरी भाली फेस-1 में ही पचास करोड़ से ज्यादा का नुकसान है। छोटी जल विद्युत परियोजनाएं भी क्षतिग्रस्त हुई है।
- जल निगम व पेयजल के दो दर्जन से ज्यादा प्रोजेक्ट्स क्षतिग्रस्त हुए हैं, प्रारंभिक तौर पर इनके लिए 100 करोड़ रुपए का एस्टीमेट भेजा गया है।

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