उत्तराखंड में धधक रहे जंगलों को बचा सकता है ड्रोन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड समेत तीन राज्यों के जंगलों में धधक रही आग की घटनाओं ने आईआईटी वैज्ञानिकों को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
आग के बाद निकल रहे धुएं के गुबार हेलीकॉप्टर के राहत कार्य में सबसे बड़ा बाधक बने हुए हैं। लेकिन इस आग पर ड्रोन तेजी से काबू पा सकता है। ड्रोन की इन्फ्रारेड किरणें धुएं के पार से भी इमेज भेजने में सक्षम है। इससे रियल टाइम (प्रति क्षण) मॉनिटरिंग संभव है। आईआईटी की फायर रिसर्च लैब में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल की योजना बनाई जा रही है।
वैज्ञानिकों के अनुसार वनों में लगने वाली आग पर तेजी से काबू पाना बेहद कठिन होता है। क्योंकि वनों के बीच जमीनी स्तर पर संसाधनों को आग तक पहुंचाने में काफी जटिलता आती है। जबकि आसमान से आग बुझाने के दौरान धुआं सबसे बड़ा बाधक बन जाता है।
आग बुझने पर भी कई घंटे तक धुआं निकलने के कारण यह पता नहीं लग पाता कि आग बुझ गई है या नहीं। इसकी सटीक जानकारी प्राप्त करने में ड्रोन तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विदेशों में इसका चलन शुरू हो गया है।
धुएं के बीच से भी उच्च तापमान पर भेजता है तस्वीरें
संस्थान के वैज्ञानिक डा. कीर्ति भूषण मिश्रा ने बताया कि ड्रोन में लगा इन्फ्रारेड कैमरा धुएं के बीच से भी उच्च तापमान पर तस्वीरें भेजता है।
इन तस्वीरों की इमेज प्रोसेसिंग तकनीक से विश्लेषण कर प्रति क्षण निर्धारित जगहों पर आग की स्थिति की जानकारी ली जा सकती है। अभी तक इसका इस्तेमाल सैन्य कार्यों के लिए ही किया जाता रहा है। उन्होंने बताया कि संस्थान स्थित फायर रिसर्च लैब में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल की योजना बनाई जा रही है। जल्द इस पर काम शुरू होने की उम्मीद है।
ईंधन के चुगान को अभियान की सिफारिश
वैज्ञानिक डा. केबी मिश्रा की मानें तो गर्मियों में अभियान के तौर पर वनों में सूखी लकड़ियों एवं पत्तों आदि का चुगान कर सफाई कराई जानी चाहिए। क्योंकि वनों में आग के तीन कारण होते हैं। पहला सूखी लकड़ियां और पत्ते आदि के तौर पर ईंधन का जमा होना, दूसरा हवा के कारण मिलने वाली आक्सीजन और तीसरा किसी बाहरी स्त्रोत की ओर से आग लगा देना।
उन्होंने बताया कि विदेशों में तय योजना के तहत अभियान चलाकर वनों की सफाई कराई जाती है। मैक्सिको स्टेट में करीब दो हजार हेक्टेयर में प्रत्येक वर्ष यह अभियान चलाया जाता है। ऐसा अभियान हमारे देश में भी चले तो हर साल बड़ी मात्रा में ईंधन तो प्राप्त होगा ही। स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार भी मिलेगा और आग से भी बचाव होगा। लेकिन इन सबसे में फारेस्ट मैनेजमेंट सबसे बड़ा मुद्दा होता है।