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रिटायर्ड राजपत्रित अधिकारी को गांव में हल चलाता देख जागरूक हो रहे लोग

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 27 Nov 2019 10:33 PM IST
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Retired principal making aware to other people
अपनी पत्नी के साथ खेत में काम करते प्रधानाचार्य त्रिलोक राम। - फोटो : CHAMPAWAT
कर्मवीर व्यक्ति कर्म से कभी नहीं हारता। खाली बैठना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं होता है। ऐसे ही एक कर्मवीर जीआईसी बापरू से सेवानिवृत्त हुए प्रधानाचार्य त्रिलोक राम आर्य हैं।
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40 साल की राजकीय सेवा के बाद त्रिलोक राम ने लधियाघाटी के दूरस्थ अपने पैतृक गांव मंगललेख में पुरखों की विरासत को आबाद कर अपनी पत्नी गीता के साथ शहर से गांव चलो की यात्रा शुरू की है।
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40 हजार रुपये मासिक पेंशन, ऊंचे ओहदों पर बेटों व बहू के होते हुए गांव में हल चला कर खेतों से सोना पैदा कर रहे आर्य को देखकर उन लोगों की आंखें खुलती जा रही है जो अपनी माटी, बंधु बांधवों, स्वच्छ हवा, पानी को छोड़कर शहरों में भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
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आर्य ने गांव में अपनी डेढ़ सौ नाली भूमि में से फिलहाल 20 नाली भूमि को आबाद कर उसमें सब्जी, फल पौध व अन्य प्रकार की खेती की है। इस वर्ष इनके यहां इतनी लौकी हुई कि उन्हें गांव में बांटनी पड़ी। उनका इरादा भविष्य में दूध का उत्पादन करने का है जिसके लिए गोशाला भी बना दिया गया है। इससे पहले वह यहां डेयरी खुलवाना चाहते है जिससे लोग दूध बेचकर अपनी आमदनी बढ़ा सकें।

बड़े ओहदों पर हैं बेटे व बहू
लोहाघाट (चंपावत)। त्रिलोक राम आर्य के गांव की ओर रुख करने से उनके बड़े बेटे राजकीय पॉलिटेक्निक के विभागाध्यक्ष कैलाश कुमार, उनकी पत्नी एसएसजे परिसर अल्मोड़ा की विभागाध्यक्ष डॉ. श्वेता, साउथ कोरिया में रिसर्च आफिसर के पद पर कार्यरत छोटा बेटा डॉ. अश्विनी और उनकी बहू बेहद खुश हैं। उनका कहना है कि माटी की खुशबू से पूर्वजों की याद तरोताजा हो जाती है।

अपने खेतों में हल जोतते प्रधानाचार्य त्रिलोक राम।

अपने खेतों में हल जोतते प्रधानाचार्य त्रिलोक राम।- फोटो : CHAMPAWAT

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