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Champawat News: दूरस्थ थपलियालखेड़ा को राजस्व गांव बनाने की कवायद शुरू
Fri, 11 Apr 2025 11:21 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Fri, 11 Apr 2025 11:21 PM IST
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टनकपुर (चंपावत)। करीब पांच दशक से अधिक समय से वन भूमि में स्थायी रूप से बसे नेपाल सीमा से घिरे दूरस्थ थपलियालखेड़ा गांव के लोग लंबे समय से राजस्व गांव घोषित करने की मांग उठा रहे हैं। अब डीएम नवनीत पांडे के निर्देश पर प्रशासन ने नए सिरे से प्रस्ताव बनाने की तैयारी शुरू कर दी है।
वन भूमि में बसा होने से मूलभूत सुविधाओं से वंचित थपलियालखेड़ा गांव के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। एसडीएम आकाश जोशी ने बताया कि डीएम की ओर से प्रस्ताव मांगा गया है। गांव में वर्तमान में 29.09 हेक्टेयर वन भूमि में 47 परिवार के 234 सदस्य और 126 मतदाता हैं। नेपाल सीमा से सटा गांव सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। तीसरी बार संशोधित प्रस्ताव जिला प्रशासन के माध्यम से सचिव राजस्व को भेजा जा रहा है। बताया कि वन अधिनियम 1980 के प्रावधान के तहत भारत सरकार से अनुमति लेने की कार्रवाई शुरू हो गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस प्रस्ताव पर निकट भविष्य में सार्थक नतीजे निकल सकते हैं।
एक नजर इतिहास : वर्ष 1930 में पहाड़ से सबसे पहले आने वालों में मोहन सिंह थे
टनकपुर (चंपावत)। थपलियाल खेड़ा गांव की बसासत का इतिहास पहाड़ से सर्दी के मौसम में तराई में जानवरों को साथ लेकर चरागाह में प्रवास से जुड़ा है। पहले के दौर में पहाड़ से सर्दी के मौसम में तराई में लोग जानवरों के साथ प्रवास में आते थे और गर्मी आते ही वापस लौट जाते थे। प्रशासन ने भी माना कि पहाड़ से प्रवास में वर्ष 1930 में मोहन सिंह सबसे पहले आने वालों में एक थे। इसके साथ ही प्रवास में लोग आते रहे। तब चरागाह में चराई की रसीद कटती थी। दीपावली के बाद जानवरों के साथ यहां आते थे और होली के बाद वापस लौट जाते थे। जब वर्ष 1970 में टनकपुर और आसपास अस्पताल आदि की सुविधा मिलने लगी तो लोग स्थाई रूप से बसने लगे। वर्ष 1999 में पहली बार यहां के मतदाताओं को वोट डालने का अधिकार मिला।
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तत्कालीन डीएम एसके माहेश्वरी ने यहां पहली बार दौरा किया था जो नेपाल होकर यहां पहुंचे थे। तब निकटवर्ती आठ किमी दूर सैलानीगोठ के मतदान केंद्र में वोट पड़े। वर्ष 2012 में थपलियालखेड़ा प्राथमिक स्कूल में मतदान केंद्र बनाया गया और ग्रामीणों को अपने गांव में यह सुविधा मिली। चंपावत मंच से करीब 60 वर्ष से अधिक समय पहले गांव आए शंकर सिंह महर ने बताया कि गांव में आज भी लाइट, अस्पताल नहीं है। सोलर लाइट के सहारे हैं। कई समस्याएं हैं। निरंतर राजस्व गांव घोषित करने की मांग उठा रहे हैं। अब 47 परिवार गांव में रहकर खेतीबाड़ी करते हैं।
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वन भूमि में बसा होने से मूलभूत सुविधाओं से वंचित थपलियालखेड़ा गांव के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। एसडीएम आकाश जोशी ने बताया कि डीएम की ओर से प्रस्ताव मांगा गया है। गांव में वर्तमान में 29.09 हेक्टेयर वन भूमि में 47 परिवार के 234 सदस्य और 126 मतदाता हैं। नेपाल सीमा से सटा गांव सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। तीसरी बार संशोधित प्रस्ताव जिला प्रशासन के माध्यम से सचिव राजस्व को भेजा जा रहा है। बताया कि वन अधिनियम 1980 के प्रावधान के तहत भारत सरकार से अनुमति लेने की कार्रवाई शुरू हो गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस प्रस्ताव पर निकट भविष्य में सार्थक नतीजे निकल सकते हैं।
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एक नजर इतिहास : वर्ष 1930 में पहाड़ से सबसे पहले आने वालों में मोहन सिंह थे
टनकपुर (चंपावत)। थपलियाल खेड़ा गांव की बसासत का इतिहास पहाड़ से सर्दी के मौसम में तराई में जानवरों को साथ लेकर चरागाह में प्रवास से जुड़ा है। पहले के दौर में पहाड़ से सर्दी के मौसम में तराई में लोग जानवरों के साथ प्रवास में आते थे और गर्मी आते ही वापस लौट जाते थे। प्रशासन ने भी माना कि पहाड़ से प्रवास में वर्ष 1930 में मोहन सिंह सबसे पहले आने वालों में एक थे। इसके साथ ही प्रवास में लोग आते रहे। तब चरागाह में चराई की रसीद कटती थी। दीपावली के बाद जानवरों के साथ यहां आते थे और होली के बाद वापस लौट जाते थे। जब वर्ष 1970 में टनकपुर और आसपास अस्पताल आदि की सुविधा मिलने लगी तो लोग स्थाई रूप से बसने लगे। वर्ष 1999 में पहली बार यहां के मतदाताओं को वोट डालने का अधिकार मिला।
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तत्कालीन डीएम एसके माहेश्वरी ने यहां पहली बार दौरा किया था जो नेपाल होकर यहां पहुंचे थे। तब निकटवर्ती आठ किमी दूर सैलानीगोठ के मतदान केंद्र में वोट पड़े। वर्ष 2012 में थपलियालखेड़ा प्राथमिक स्कूल में मतदान केंद्र बनाया गया और ग्रामीणों को अपने गांव में यह सुविधा मिली। चंपावत मंच से करीब 60 वर्ष से अधिक समय पहले गांव आए शंकर सिंह महर ने बताया कि गांव में आज भी लाइट, अस्पताल नहीं है। सोलर लाइट के सहारे हैं। कई समस्याएं हैं। निरंतर राजस्व गांव घोषित करने की मांग उठा रहे हैं। अब 47 परिवार गांव में रहकर खेतीबाड़ी करते हैं।