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सीएम के एलान के छह साल बाद भी लटकी है बनबसा गैस एजेंसी
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चंपावत। जिले के प्रवेशद्वार बनबसा को भले ही नगर पंचायत का दर्जा मिले तीन साल हो गए हों, लेकिन मुख्यमंत्रियों के एलान के बावजूद यहां एक अदद गैस एजेंसी नहीं खुल पा रही है।
इसका नतीजा यह हो रहा है कि बनबसा और आसपास के गांवों के छह हजार से अधिक उपभोक्ताओं को 12 किमी दूर टनकपुर जाना पड़ रहा है। इससे जेब पर मार पड़ने के साथ अतिरिक्त समय भी बर्बाद हो रहा है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 10 अप्रैल 2015 को बनबसा में गैस एजेंसी की स्थापना की घोषणा की। उनकी इस घोषणा के बाद कांग्रेस की सरकार हट गई और भाजपा की सरकार बनी।
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इस अवधि में प्रदेश को चौथे मुख्यमंत्री मिले, लेकिन बनबसा को एक गैस एजेंसी की सुविधा नहीं मिल सकी है। सवा छह साल तक एजेंसी की कार्रवाई पूरी न होने के बाद अब पहली सितंबर को मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसका एलान किया है।
टनकपुर के एसडीएम हिमांशु कफल्टिया का कहना है कि सितंबर 2015 को सिंचाई विभाग यूपी की प्रबंध वाली तीन बीघा जमीन का चयन किया गया था, लेकिन केएमवीएन की ओर से इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी गई थी।
बनबसा में हर माह सात बार टनकपुर से गैस सिलिंडर की आपूर्ति ट्रक से होती है, लेकिन ये नाकाफी है। इसके चलते बनबसा के लोग गैस सिलिंडर रीफिल कराने के लिए टनकपुर दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
वैसे जिले में 57 हजार उपभोक्ताओं के लिए चंपावत, लोहाघाट, देवीधुरा, टनकपुर में चार गैस एजेंसियां हैं। इधर डीएम विनीत तोमर का कहना है कि बनबसा में गैस एजेंसी सहित मुख्यमंत्री की सभी घोषणाओं के क्रियान्वयन के लिए जल्द जरूरी प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
बेकाम के हैं गांवों के गैस गोदाम, सिलिंडर को लग रही दौड़
चंपावत। जिले के चार ग्रामीण क्षेत्रों में गैस गोदाम बनाए गए, लेकिन इनका लाभ ग्रामीणों को कभी नहीं मिल सका। अब इनमें से एक गोदाम (रौसाल) को दो महीने पहले दुग्ध संघ के ग्रोथ सेंटर को दी गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल कटान को रोकने और ईंधन सुविधा गांव के नजदीक मुहैय्या कराने के लिए पाटी, तामली, श्यामलाताल, रौसाल में गैस गोदाम का निर्माण किया गया था। दो दशक पहले निर्मित इन भवनों के निर्माण में लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन इन गोदामों का उपयोग कभी नहीं हो सका।
अब ज्यादातर भवन इस लायक भी नहीं रह गए हैं, कि इनका इस्तेमाल हो सके। इन गोदामों में घास उग आई है, छत टूट गई है। इन गोदामों को हस्तांतरित न करने और रखरखाव के अभाव से यह गोदाम खंडहर में तब्दील हो गए हैं। गैस वितरण केंद्र के प्रभारी प्रकाश मुरारी का कहना है कि दूरदराज के सड़क से लगे गांवों में महीने में एक दिन सिलिंडर का ट्रक भेजा जाता है।
जिले का प्रवेशद्वार है सीमांत बनबसा, लेकिन यहां गैस एजेंसी जैसी जरूरी सुविधा राज्य बनने के 20 साल बाद नहीं बन सका है। ये हाल दो मुख्यमंत्रियों के एलान के बाद है। इससे लोगों को सिलिंडर के लिए ढुलान पर अतिरिक्त राशि खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
- प्रेम चंद, राज्य आंदोलनकारी, बनबसा।
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इसका नतीजा यह हो रहा है कि बनबसा और आसपास के गांवों के छह हजार से अधिक उपभोक्ताओं को 12 किमी दूर टनकपुर जाना पड़ रहा है। इससे जेब पर मार पड़ने के साथ अतिरिक्त समय भी बर्बाद हो रहा है।
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तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 10 अप्रैल 2015 को बनबसा में गैस एजेंसी की स्थापना की घोषणा की। उनकी इस घोषणा के बाद कांग्रेस की सरकार हट गई और भाजपा की सरकार बनी।
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इस अवधि में प्रदेश को चौथे मुख्यमंत्री मिले, लेकिन बनबसा को एक गैस एजेंसी की सुविधा नहीं मिल सकी है। सवा छह साल तक एजेंसी की कार्रवाई पूरी न होने के बाद अब पहली सितंबर को मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसका एलान किया है।
टनकपुर के एसडीएम हिमांशु कफल्टिया का कहना है कि सितंबर 2015 को सिंचाई विभाग यूपी की प्रबंध वाली तीन बीघा जमीन का चयन किया गया था, लेकिन केएमवीएन की ओर से इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी गई थी।
बनबसा में हर माह सात बार टनकपुर से गैस सिलिंडर की आपूर्ति ट्रक से होती है, लेकिन ये नाकाफी है। इसके चलते बनबसा के लोग गैस सिलिंडर रीफिल कराने के लिए टनकपुर दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
वैसे जिले में 57 हजार उपभोक्ताओं के लिए चंपावत, लोहाघाट, देवीधुरा, टनकपुर में चार गैस एजेंसियां हैं। इधर डीएम विनीत तोमर का कहना है कि बनबसा में गैस एजेंसी सहित मुख्यमंत्री की सभी घोषणाओं के क्रियान्वयन के लिए जल्द जरूरी प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
बेकाम के हैं गांवों के गैस गोदाम, सिलिंडर को लग रही दौड़
चंपावत। जिले के चार ग्रामीण क्षेत्रों में गैस गोदाम बनाए गए, लेकिन इनका लाभ ग्रामीणों को कभी नहीं मिल सका। अब इनमें से एक गोदाम (रौसाल) को दो महीने पहले दुग्ध संघ के ग्रोथ सेंटर को दी गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल कटान को रोकने और ईंधन सुविधा गांव के नजदीक मुहैय्या कराने के लिए पाटी, तामली, श्यामलाताल, रौसाल में गैस गोदाम का निर्माण किया गया था। दो दशक पहले निर्मित इन भवनों के निर्माण में लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन इन गोदामों का उपयोग कभी नहीं हो सका।
अब ज्यादातर भवन इस लायक भी नहीं रह गए हैं, कि इनका इस्तेमाल हो सके। इन गोदामों में घास उग आई है, छत टूट गई है। इन गोदामों को हस्तांतरित न करने और रखरखाव के अभाव से यह गोदाम खंडहर में तब्दील हो गए हैं। गैस वितरण केंद्र के प्रभारी प्रकाश मुरारी का कहना है कि दूरदराज के सड़क से लगे गांवों में महीने में एक दिन सिलिंडर का ट्रक भेजा जाता है।
जिले का प्रवेशद्वार है सीमांत बनबसा, लेकिन यहां गैस एजेंसी जैसी जरूरी सुविधा राज्य बनने के 20 साल बाद नहीं बन सका है। ये हाल दो मुख्यमंत्रियों के एलान के बाद है। इससे लोगों को सिलिंडर के लिए ढुलान पर अतिरिक्त राशि खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
- प्रेम चंद, राज्य आंदोलनकारी, बनबसा।