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Champawat News: दून की लकड़ी और रेगिस्तान के पत्थर भरेंगे बालेश्वर के इतिहास में रंग
Thu, 12 Feb 2026 11:11 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Thu, 12 Feb 2026 11:11 PM IST
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चंपावत के मुख्य बालेश्वर मंदिर में लगी छत। संवाद
चंपावत। नगर के ऐतिहासिक बालेश्वर मंदिर समूह को संवारने के लिए देहरादून की लकड़ी और राजस्थान के पत्थर का उपयोग किया जा रहा है। मंदिर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का कार्य एएसआई की देखरेख में किया जा रहा है। मुख्य मंदिर के साथ ही धर्मशाला का जीर्णोद्धार हो रहा है।
मुख्य मंदिर में लकड़ी की छत के ऊपर कॉपर सीट लगाने का काम किया जा रहा है, इससे श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी। वह बिना किसी रुकावट के अपनी पूजा अर्चना जारी रखे सकेंगे। पूर्व में छत क्षतिग्रस्त होने से मंदिर समिति ने प्लास्टिक की पन्नी लगाई थी। मंदिर के महंत पवन गिरी ने बताया कि मान्यता है कि बालेश्वर महादेव का पूजन करने से श्रद्धालुओं को चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। बालेश्वर की पूजा करने से श्रद्धालुओं को काशी विश्वनाथ का पूजन करने के समान ही फल मिलता है।
पूर्व में यह मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग का प्रमुख पड़ाव भी था। कैलाश मानसरोवर यात्री बालेश्वर मंदिर समूह में बनी धर्मशालाओं में ही विश्राम करते थे। मंदिर परिसर में स्थित नौले का भी सौंदर्यीकरण कर दिया गया है। 13वीं शताब्दी में स्थापित बालेश्वर मंदिर खजुराहो शैली को भी खुद में समेटे हुए है। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का बालेश्वर मंदिर समूह पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। बालेश्वर मंदिर ने 1742 में रुहेलो का आक्रमण भी झेला है। तब की खंडित हुई मूर्तियों को मंदिर परिसर में सहेजा गया है। यहां भगवान शिव के अलावा यहां मां भगवती, चंपा देवी, भैरव, गणेश, मां काली की मूर्तियां हैं। इसके महत्व को देखते हुए 1916 में एएसआई ने मंदिर को अपने संरक्षण में लिया था।
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मुख्य मंदिर में लकड़ी की छत के ऊपर कॉपर सीट लगाने का काम किया जा रहा है, इससे श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी। वह बिना किसी रुकावट के अपनी पूजा अर्चना जारी रखे सकेंगे। पूर्व में छत क्षतिग्रस्त होने से मंदिर समिति ने प्लास्टिक की पन्नी लगाई थी। मंदिर के महंत पवन गिरी ने बताया कि मान्यता है कि बालेश्वर महादेव का पूजन करने से श्रद्धालुओं को चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। बालेश्वर की पूजा करने से श्रद्धालुओं को काशी विश्वनाथ का पूजन करने के समान ही फल मिलता है।
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पूर्व में यह मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग का प्रमुख पड़ाव भी था। कैलाश मानसरोवर यात्री बालेश्वर मंदिर समूह में बनी धर्मशालाओं में ही विश्राम करते थे। मंदिर परिसर में स्थित नौले का भी सौंदर्यीकरण कर दिया गया है। 13वीं शताब्दी में स्थापित बालेश्वर मंदिर खजुराहो शैली को भी खुद में समेटे हुए है। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का बालेश्वर मंदिर समूह पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। बालेश्वर मंदिर ने 1742 में रुहेलो का आक्रमण भी झेला है। तब की खंडित हुई मूर्तियों को मंदिर परिसर में सहेजा गया है। यहां भगवान शिव के अलावा यहां मां भगवती, चंपा देवी, भैरव, गणेश, मां काली की मूर्तियां हैं। इसके महत्व को देखते हुए 1916 में एएसआई ने मंदिर को अपने संरक्षण में लिया था।
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