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पेंट से सजाई जा रही हैं घरों की दहलीजें
Updated Mon, 16 Oct 2017 11:19 PM IST
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चंपावत। दीपावली पर्व में धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए घरों को ऐंपण (अल्पना) से सजाने की परंपरा धीरे-धीरे हाशिए में समाते जा रही है। परंपरागत ऐंपण का स्थान पेंट और स्टीकरों ने ले लिया है।
गौरतलब है कि पूर्व में लक्ष्मी पूजन के लिए घरों में रंग वार्निश के साथ ही चूना पुताई कर ऐंपण डाले जाते थे, जिसके लिए पहले दहलीजों की गेरू से पुताई कर उसमें कसार (चावल से बने आटे) की धार देकर ऐंपण तैयार किए जाते थे। यहीं नहीं घर के दरवाजे से बाहर तक लक्ष्मी माता के चरणों के निशान भी ऐंपण से तैयार किए जाते थे, लेकिन समय बदलने के साथ परंपराओं में भी बदलाव आया है। घरों की देहरी सजाने के लिए पेंट और स्टीकर का सहारा लिया जाने लगा है।
गृहणी आशा, कविता, सीमा आदि का कहना है कि कसार और गेरू से पुताई कर डाले जाने वाले परंपरागत ऐपण ज्यादा टिकाऊ नहीं होते। कुछ ही दिनों बाद ये ऐपण मिट जाते हैं। उनका कहना है कि पेंट से डाले जाने वाले ऐंपण बनाने में भले ही वक्त ज्यादा लगता है, लेकिन ये ऐंपण काफी टिकाऊ होते हैं। यही वजह है कि लोग अब पेंट से देहरी सजाने लगे हैं।
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गौरतलब है कि पूर्व में लक्ष्मी पूजन के लिए घरों में रंग वार्निश के साथ ही चूना पुताई कर ऐंपण डाले जाते थे, जिसके लिए पहले दहलीजों की गेरू से पुताई कर उसमें कसार (चावल से बने आटे) की धार देकर ऐंपण तैयार किए जाते थे। यहीं नहीं घर के दरवाजे से बाहर तक लक्ष्मी माता के चरणों के निशान भी ऐंपण से तैयार किए जाते थे, लेकिन समय बदलने के साथ परंपराओं में भी बदलाव आया है। घरों की देहरी सजाने के लिए पेंट और स्टीकर का सहारा लिया जाने लगा है।
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गृहणी आशा, कविता, सीमा आदि का कहना है कि कसार और गेरू से पुताई कर डाले जाने वाले परंपरागत ऐपण ज्यादा टिकाऊ नहीं होते। कुछ ही दिनों बाद ये ऐपण मिट जाते हैं। उनका कहना है कि पेंट से डाले जाने वाले ऐंपण बनाने में भले ही वक्त ज्यादा लगता है, लेकिन ये ऐंपण काफी टिकाऊ होते हैं। यही वजह है कि लोग अब पेंट से देहरी सजाने लगे हैं।
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