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धूल खाती रही रिपोर्ट, आती रही आपदा
देहरादून/प्रवेश कुमारी
Updated Fri, 21 Jun 2013 02:45 PM IST
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उत्तराखंड के जख्म अभी हरे हैं। केदारघाटी में आई तबाही में हजारों जानें जा चुकी हैं, जो बच गए अपने जीवन को ‘नया जन्म’ मान रहे हैं। तबाही का मंजर देख चुके लोगों की आंखें और दिल अभी तक खौफजदा है।
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उत्तराखंड में आपदाएं कम हो सकती थीं
सच है कि आपदा अपने हाथ में नहीं, लेकिन अगर 43 साल पहले की आपदा से सबक लिया जाता तो शायद उत्तराखंड में आपदाएं कम हो सकती थीं, इनसे होने वाला नुकसान कम हो सकता था। 1970 में अलकनंदा में आई इस सबसे बड़ी बाढ़ जैसी घटना के दोहराव का खतरा कृषि मंत्रालय की ओर से उच्च स्तरीय इंटर डिपार्टमेंटल कमेटी ने भी जताया था।
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उसने इस बाढ़ के साथ ही 1998 में ऊखीमठ में लैंड स्लाइड से हुए बड़े नुकसान को आधार बनाकर पेश किया था।
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विशेषज्ञों ने तैयार की रिपोर्ट
मई 2001 में अपनी रिपोर्ट दी थी। दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल गोपेश्वर की मदद से स्पेस एप्लिकेशंस सेंटर (सैक), अहमदाबाद, फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के विशेषज्ञों ने रिपोर्ट तैयार की थी। ‘लैंड स्लाइड इंड्यूस्ड फ्लड्स इन द अपर अलकनंदा बेसिन’ शीर्षक की इस रिपोर्ट में रूद्रप्रयाग, चमोली, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग और श्रीनगर जैसे गंगा किनारे बसे पांच शहरों को संवेदनशील बताते हुए इन पर 1970 जैसी बाढ़का खतरा बताया गया था।
चमोली क्षेत्र में 1200 मीटर, जबकि चमोली से श्रीनगर तक 800-600 मीटर के एरिया को बेहद खतरनाक जोन में रखा गया था। जरूरी सुझाव दिए गए थे, लेकिन सरकारी मशीनरी नहीं चेती। एक के बाद एक आपदा राज्य झेल रहा है, लेकिन रिपोर्ट धूल खा रही है।
रिपोर्ट में यह दिए गए थे सुझाव
-डेंजर लिमिट का डिमार्केशन कर स्थानीय लोगों को बाढ़ के खतरे पर जागरूक किया जाए।
-थ्रस्ट जोन में जीपीएस सिस्टम नेटवर्क तैयार किया जाए। सेटेलाइट कम्युनिकेशन से जोड़ा जाए।
-वृहद स्तर पर मीटीरियोलाजिकल, सीस्मोलाजिकल डाटा स्टेशन तैयार किए जाएं।
-इस डाटा के आधार पर विभिन्न विभागों से समन्वय किया जाए ताकि योजना, निर्माण में दोष न रहे।
-लैंडस्लाइड प्रभावित क्षेत्रों के पारिस्थितिकीय-पुनर्वास के साथ ही बायो इंजीनियरिंग टेकभनोलाजी का प्रयोग किया जाए।
-विदेशों की तर्ज पर बांधों और झीलों की हाइड्रोलाजी के बारे में विस्तृत सूचनाएं उपलब्ध कराई जाएं।
-युवक मंगल दल, महिला मंगल दलों को आपदा के लिहाज से प्रशिक्षित किया जाए ताकि त्रासदी का असर कम हो।
-आपदा संभावित क्षेत्र के मद्देनजर स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस दिया जाए, यहां से जुड़े सुझावों पर प्राथमिकता से अमल हो।
अपर अलकनंदा बेसिन में हाईरिस्क एरिया का हाल
जिला हाइरिस्क एरिया के गांव कुल जनसंख्या संवेदनशील जोन में जनसंख्या
चमोली 225 220410 46 021
रूद्रप्रयाग 65 81679 14772
पौड़ी 7 6390 972
बागेश्वर 4 3346 1487
कुल 301 311825 63 252
प्लानिंग की बेहद जरूरत
1970 में आई बाढ़ के बाद ही प्रकृति यानी पेड़ों को बचाने केलिए चिपको आंदोलन शुरू हुआ था। राज्य में आपदा संभावित क्षेत्र बहुत से हैं। प्लानिंग से चलने की बेहद जरूरत है।
-डा. एमएम किमोठी, निदेशक, उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यू-सैक)
(डा. किमोठी रिपोर्ट तैयार करने वाले तीन विशेषज्ञों में से एक थे। इनके साथ नवीन जुयाल और ओमप्रकाश भट्ट ने इस पर कार्य किया था)