फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Bageshwar News ›   World Bamboo Day Special: Ringal has been handwoven for generations, but market access is limited

विश्व बैंबू दिवस पर विशेष : पीढ़ियों से रिंगाल बुन रहे हाथ, लेकिन बाजार तक पहुंच सीमित

Fri, 18 Sep 2026 12:59 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर Updated Fri, 18 Sep 2026 12:59 AM IST
विज्ञापन
World Bamboo Day Special: Ringal has been handwoven for generations, but market access is limited
कपकोट के भनार गांव में तैयार रिंगाल के उत्पाद।
बागेश्वर। जिले के दूरस्थ इलाकों तक रिंगाल (पहाड़ी बांस) से टोकरियां, सूप, चटाइयां और सजावटी सामान तैयार करने वाले हस्तशिल्पियों के हुनर की चमक अब फीकी पड़ने लगी है। 18 सितंबर को मनाए जाने वाले विश्व बैंबू दिवस पर जब दुनिया बांस के टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल भविष्य की बात कर रही है, तब कुमाऊं के रिंगाल कारीगर अपनी ही चौखट पर आर्थिक तंगी और बाजार के अभाव से जंग लड़ रहे हैं।
विज्ञापन

जिले के दुर्गम भनार गांव में इस पारंपरिक हुनर के जमीनी सच को बयां करती है। गांव में जो बुजुर्ग और अनुभवी हाथ आज रिंगाल छीलकर उत्पाद बना रहे हैं, वे इस हुनर की संभवतः अंतिम पीढ़ी हैं। युवाओं ने कम होती आमदनी और अधिक मेहनत के कारण इस पुश्तैनी काम से मुंह मोड़ लिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर और खेती-किसानी के कार्यों के लिए प्लास्टिक के सस्ते बर्तनों और तसलों के आने से रिंगाल के स्थानीय बाजार को तगड़ा झटका लगा है। कुमाउंनी परंपरा में नामकरण संस्कार के दौरान नवजात के घर भेजी जाने वाली पारंपरिक डलिया का स्थान अब आधुनिक फैंसी झूलों ने ले लिया है। अनाज सुखाने और बिछाने के लिए इस्तेमाल होने वाली रिंगाल की पारंपरिक चटाइयों की जगह वाटरप्रूफ तिरपाल ने ले ली है। पहाड़ों में तेजी से बंजर होते खेत-खलिहानों ने भी इन कृषि-आधारित उत्पादों की मांग घटा दी है।
विज्ञापन


मेहनत से आधी कीमत, बिचौलियों के जाल में कारीगर
रिंगाल के उत्पाद तैयार करने में जंगल से कच्चा माल लाने से लेकर उसे बारीक छीलने और बुनने में घंटों की कड़ी मेहनत लगती है। भनार गांव में एक डोका (बड़ी टोकरी) 500, सूप 180, डलिया 300 और छापरा 150 में बिकता है, जो मेहनत के हिसाब से बेहद कम है। विडंबना यह है कि बड़े शहरों और महानगरों में रिंगाल के इको-फ्रेंडली और सजावटी सामानों लैंपशेड, टोकरियां, ट्रे की जबरदस्त मांग है, लेकिन पहाड़ों के इन दूरस्थ कारीगरों की सीधे बाजार तक पहुंच ही नहीं है। बिचौलिए इन कारीगरों से कम दामों में सामान खरीदकर शहरों में तीन से चार गुना महंगे दामों पर बेचते हैं, जबकि असली हुनरमंद के हाथ खाली रह जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


जंगलों से रिंगाल काटकर लाना और फिर दिन-रात एक करके सामान बनाना बेहद मेहनत का काम है। पहले जब लोग खेती-किसानी पर निर्भर थे और प्लास्टिक का दौर नहीं था, तब हमारे सामान की कद्र थी और अच्छे दाम मिलते थे। अब लागत और मेहनत भी नहीं निकल पाती। -मोहन सिंह, कारीगर

प्लास्टिक के सामानों ने हमारे पुश्तैनी कारोबार की कमर तोड़ दी है। गांवों में खेती कम हो गई है और परंपराएं भी बदल रही हैं। अब नामकरण में डलिया की जगह लोग बाजार से प्लास्टिक या लोहे के फैंसी झूले ले जा रहे हैं। जब गांव में ही मांग नहीं बची तो हम क्या करें। -प्रताप सिंह, कारीगर


शहरों में हमारे बनाए सामान महंगे दामों पर बिकते हैं, लेकिन हमारे पास सीधे शहर जाकर बेचने के न तो साधन हैं और न ही व्यवस्था। बिचौलिए जो दाम तय कर देते हैं, मजबूरी में उसी पर सामान देना पड़ता है। बच्चों को इसमें कोई भविष्य नहीं दिखता, इसलिए वे इस काम को छोड़ चुके हैं। अगर सरकार सीधे बाजार मुहैया न कराए, तो यह कला खत्म हो जाएगी। - दीवान सिंह, कारीगर
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed