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दर्शक दीर्घा से निकलकर मंच तक पहुंची नारी शक्ति
अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर
Updated Mon, 10 Oct 2016 11:17 PM IST
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रामलीला में प्रतिभाग करती महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
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एक दौर में रामलीला के आयोजन में महज दर्शक दीर्घा में सिमटी रहने वाली ग्रामीण महिलाएं आज मंच पर पात्रों की भूमिका बखूबी निभा रही हैं। बागेश्वर जिले के भराड़ी कस्बे में होने वाली रामलीला में महिलाएं अभिनय के साथ ही कमेटी में भी सक्रिय भागीदारी कर रही हैं। यह पुरुषों के वर्चस्व वाले कार्य क्षेत्र में नारी शक्ति के उदाहरण के तौर पर भी इसे देखा जा सकता है।
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1938 में बागेश्वर जिले के कपकोट में पहली बार रामलीला का मंचन किया गया। यह वह दौर था जब रामलीला मंचन सीमित संसाधनों के बीच चीड़ के छिलकों की रोशनी में की जाती थी। धीरे-धीरे संसाधन जुटते रहे तो रामलीला के मंचन का प्रस्तुतीकरण भी बेहतर होने लगा, लेकिन छह दशकों से भी लंबे समय तक रामलीला में महिलाओं की भूमिका केवल दर्शक की ही रही। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिला पात्रों की कल्पना तक कोई नहीं कर सकता था।
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कौशल्या, सुमित्रा, कैकई, सीता, गौरी से लेकर सूर्पणखा, मंदोदरी तक के पात्रों का अभिनय पुरुष ही निभाते थे। अभिनय के लिए प्रशिक्षण की जरूरत भी होती थी, लेकिन रामलीला से पहले होने वाली तालीम के लिए समय निकालना भी कामकाजी महिलाओं के लिए आसान नहीं था। धीरे-धीरे लोगों की सोच बदली तो महिलाओं को भी दर्शक दीर्घा से मंच तक पहुंचने का मौका मिला। यह बदलाव बागेश्वर जिले में भी हुआ। देर से ही सही कपकोट के भराड़ी में लगभग पांच साल पहले महिलाओं को भी अभिनय का मौका मिला।
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स्कूली छात्राओं ने महिला पात्रों की भूमिका निभानी शुरू की। आज इस रामलीला में महिलाएं केवल मंच पर अभिनय ही नहीं बल्कि कमेटी में सक्रिय सदस्य भी हैं। रामलीला कमेटी के व्यवस्थापक शेर सिंह ऐठानी कहते हैं कि आज हर क्षेत्र में महिलाएं अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है। भराड़ी कमेटी में सात महिला सदस्य हैं। आने वाले समय में रामलीला के आयोजन में महिलाओं को और अधिक अवसर दिए जाएंगे।