Exclusive: शवदाह के समय बागनाथ में नहीं लगता शिव को भोग, दिनभर जलते हैं पार्थिव शरीर; रात को पूरी होती है रस्म
बागेश्वर नगर के श्रीबागनाथ मंदिर और सरयू-गोमती तट का श्मशानघाट यहां आने वालों को काशी या बनारस की याद दिलाता है। शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जिस दौरान शवदाह होता है, उस समय यहां भोले को भोग नहीं लगता है।
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बागेश्वर नगरी को कुमाऊं की काशी कहा जाता है। नगर के श्रीबागनाथ मंदिर और सरयू-गोमती तट का श्मशानघाट यहां आने वालों को काशी या बनारस की याद दिलाता है। शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जिस दौरान शवदाह होता है, उस समय यहां भोले को भोग नहीं लगता है। अगर पूरे दिन शव जलते रहे तो फिर रात को मिठाई का भोग लगाकर रस्म अदायगी की जाती है।
बागनाथ मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष नंदन सिंह रावल ने बताया कि बागनाथ मंदिर में भगवान शिव को दाल-भात का भोग लगाया जाता है। भोग लगाने का नियत समय सुबह नौ से दस बजे का है। अगर इस दौरान कोई शव जल रहा होता है तो भोग का समय आगे बढ़ा दिया जाता है। शाम चार बजे तक भगवान शिव को दाल-भात का भोग लगता है। अगर सुबह से शाम के चार बजे तक भी श्मशानघाट पर शव जलते रहे तो उस दिन भगवान बागनाथ को दाल-भात का भोग नहीं लग पाता है। ऐसे में रात को आठ से नौ बजे के बीच होने वाली शयन आरती के समय मिठाई से भोग लगाकर रस्म पूरी की जाती है। उन्होंने बताया कि महीने में तीन से चार दिन ऐसे हालात बन जाते हैं, जब भगवान शिव को दाल-भात का भोग नहीं लग पाता है।
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भोग से पहले होता है श्रृंगार
बागनाथ मंदिर में भोग लगाने से पूर्व पूरी तरह से सफाई की जाती है। फिर शिव-शक्ति का श्रृंगार किया जाता है। श्रृंगार के बाद मुख्य सेवक भोग लगाते हैं। इस दौरान मंदिर में पर्दा रहता है और मंदिर के भीतर प्रवेश वर्जित रहता है।