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Bageshwar News: सड़क का सपना अधूरा लिए दुनिया से अलविदा कह गई चंद्रा देवी
Tue, 25 Aug 2026 12:05 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Tue, 25 Aug 2026 12:05 AM IST
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कपकोट में कर्मी के सापुली तोक में दुर्गम रास्तों से चंद्रा देवी की अंतिम यात्रा निकालते ग्रामीण
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कपकोट (बागेश्वर)। विकास के तमाम दावों और घोषणाओं के बीच तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत कर्मी के सापुली तोक में सड़क की मांग का दर्द एक बार फिर सामने आया है। गांव की वृद्ध महिला चंद्रा देवी (70) जीवन भर गांव तक सड़क पहुंचने का सपना देखती रहीं, लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। रविवार को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
चंद्रा देवी के भतीजे नरेंद्र दानू ने बताया कि उनकी चाची आजीवन अविवाहित रहकर अपने भाइयों के साथ रहती थीं। गांव तक सड़क न होने के कारण जब भी वे बीमार पड़ती थीं, ग्रामीणों को उन्हें दो किलोमीटर पैदल मार्ग से डोली में लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता था। निधन के बाद भी परिजन और गांव वाले उनके पार्थिव शरीर को दो किमी पैदल और फिर वहां से एक किमी दूर श्मशान घाट तक ले जाने को मजबूर हुए। ग्रामीण नरेंद्र दानू ने बताया कि वर्ष 2016 में तत्कालीन सीएम की घोषणा के तहत सापुली गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने की स्वीकृति मिली थी। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी यह घोषणा केवल कागजों तक ही सीमित है। सड़क और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सापुली तोक से तेजी से पलायन हुआ है। आलम यह है कि बच्चों की कमी के चलते गांव का जूनियर हाईस्कूल बंद हो चुका है।
भू-धंसाव की जद में गांव, श्रमदान करने को मजबूर युवा
गांव में आज भी आवाजाही के लिए सुरक्षित रास्ते तक नहीं हैं। हाल ही में गांव के युवाओं और महिलाओं ने स्वयं श्रमदान करके झाड़ियां साफ कीं और पैदल रास्तों को चलने लायक बनाया। पूरा गांव धीरे-धीरे भू-धंसाव की चपेट में आ रहा है, जिससे कई मकानों में गहरी दरारें आ चुकी हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क का निर्माण और भू-धंसाव से सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए, तो बचा हुआ गांव भी खाली होने की कगार पर पहुंच जाएगा।
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चंद्रा देवी के भतीजे नरेंद्र दानू ने बताया कि उनकी चाची आजीवन अविवाहित रहकर अपने भाइयों के साथ रहती थीं। गांव तक सड़क न होने के कारण जब भी वे बीमार पड़ती थीं, ग्रामीणों को उन्हें दो किलोमीटर पैदल मार्ग से डोली में लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता था। निधन के बाद भी परिजन और गांव वाले उनके पार्थिव शरीर को दो किमी पैदल और फिर वहां से एक किमी दूर श्मशान घाट तक ले जाने को मजबूर हुए। ग्रामीण नरेंद्र दानू ने बताया कि वर्ष 2016 में तत्कालीन सीएम की घोषणा के तहत सापुली गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने की स्वीकृति मिली थी। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी यह घोषणा केवल कागजों तक ही सीमित है। सड़क और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सापुली तोक से तेजी से पलायन हुआ है। आलम यह है कि बच्चों की कमी के चलते गांव का जूनियर हाईस्कूल बंद हो चुका है।
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भू-धंसाव की जद में गांव, श्रमदान करने को मजबूर युवा
गांव में आज भी आवाजाही के लिए सुरक्षित रास्ते तक नहीं हैं। हाल ही में गांव के युवाओं और महिलाओं ने स्वयं श्रमदान करके झाड़ियां साफ कीं और पैदल रास्तों को चलने लायक बनाया। पूरा गांव धीरे-धीरे भू-धंसाव की चपेट में आ रहा है, जिससे कई मकानों में गहरी दरारें आ चुकी हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क का निर्माण और भू-धंसाव से सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए, तो बचा हुआ गांव भी खाली होने की कगार पर पहुंच जाएगा।
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