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उत्तरायणी में खूब बिक रही काली कुमाऊं की कड़ाही
Bageshwar
Updated Thu, 16 Jan 2014 05:55 AM IST
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बागेश्वर। काली कुमाऊं की हस्त निर्मित भदेले (कड़ाई) में बनी सब्जियों और पकवान के स्वाद लेने वाले उत्तरायणी मेले से भदेलों की जमकर खरीदारी कर रहे हैं। मेले में सजी अन्य अस्थायी दुकानाें की तुलना में भदेलों की दुकानाें में अच्छी भीड़ रहती है। मैदानी क्षेत्र से आए मेलार्थी जमकर भदेले क्रय कर रहे हैं।
उत्तरायणी मेले में ऊन से बनी वस्तुओं के बाद काली कुमाऊं के बने भदेलों की बिक्री काफी है। चंपावत जिले के काली कुमाऊं के लोग उत्तरायणी मेले में भदेले बेचने को आजादी से पहले से आ रहे हैं। चंपावत जिले के भगीरथ भट्ट ने बताया कि जिले के बाराकोट और पाटी ब्लाक केे दर्जनों परिवार सालों से घर पर भदेले और कृषि यंत्र बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। पार्टी ब्लाक के रतियूड़ा गांव निवासी महेश कुमार टम्टा ने बताया कि वह बाजार से लोहा क्रय पर उसे भट्टी में गलाने के बाद तराशते हैं। उन्होंने बताया कि घर में बने भेदलों में बरसात में भी जंग नहीं लगता। काली कुमाऊं के भदेले बचने वाले व्यापारियों ने बताया कि उनके पूर्वज उन्हें बताते थे कि पूर्व में चंपावत के बरंग में लोहे की खान थी। बागेश्वर के पूर्व ब्लाक प्रमुख इंद्र सिंह परिहार ने बताया कि काली कुमाऊं के भदेले उत्तरायणी मेले का मुख्य व्यापारिक आकर्षण है।
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उत्तरायणी मेले में ऊन से बनी वस्तुओं के बाद काली कुमाऊं के बने भदेलों की बिक्री काफी है। चंपावत जिले के काली कुमाऊं के लोग उत्तरायणी मेले में भदेले बेचने को आजादी से पहले से आ रहे हैं। चंपावत जिले के भगीरथ भट्ट ने बताया कि जिले के बाराकोट और पाटी ब्लाक केे दर्जनों परिवार सालों से घर पर भदेले और कृषि यंत्र बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। पार्टी ब्लाक के रतियूड़ा गांव निवासी महेश कुमार टम्टा ने बताया कि वह बाजार से लोहा क्रय पर उसे भट्टी में गलाने के बाद तराशते हैं। उन्होंने बताया कि घर में बने भेदलों में बरसात में भी जंग नहीं लगता। काली कुमाऊं के भदेले बचने वाले व्यापारियों ने बताया कि उनके पूर्वज उन्हें बताते थे कि पूर्व में चंपावत के बरंग में लोहे की खान थी। बागेश्वर के पूर्व ब्लाक प्रमुख इंद्र सिंह परिहार ने बताया कि काली कुमाऊं के भदेले उत्तरायणी मेले का मुख्य व्यापारिक आकर्षण है।
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