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मां कालिंका की पूजा के लिए उमड़ा जन सैलाब
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा।
Updated Sat, 23 Dec 2017 10:51 PM IST
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कालिंका मंदिर में उमड़ी लोगों की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला
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कुमाऊं-गढ़वाल की सीमा रेखा में हर तीन साल में मनाया जाने वाला लखौरा के कालिंका मेले में शनिवार को हजारों भक्तों की भीड़ ऐतिहासिक पूजा की गवाह बनी। प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में करीब पंद्रह सौ नारियलों की बलि चढ़ाई गई। अव्यवस्था का आलम यह रहा कि सुबह से देर शाम तक इस मार्ग में पंद्रह किमी तक लंबा जाम लगा रहा।
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परंपरा के अनुसार पौड़ी गढ़वाल के ऐतिहासिक बडियारगढ़ क्षेत्र से सैकड़ों ग्रामीण चांदी के छत्र आदि लेकर सराईखेत के रास्ते करीब दस किमी पैदल चलकर तीन दिन पूर्व कालिंका की चोटी पर पहुंचेे। कुमाऊं-गढ़वाल के हजारों लोग भी इस पूजा में शामिल होने कालिंका मंदिर पहुंचे। पूजा के बाद डंगरियों पर देवी का अवतरण हुआ। जिसके बाद परंपरागत बडियाली जाति के लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू की। पूर्व के सालों में यहां पूजा के अंतिम दिन करीब पंद्रह सौ भैंसों, बकरी, भेड़ों की बलि दी जाती थी, लेकिन हाइकोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में शनिवार को अंतिम दिन नारियल बलि के साथ पूजा संपन्न की गई। इस दौरान भक्तों ने सोने, चांदी के छत्र भी देवी को चढ़ाए। बाद में भंडारे का भी आयोजन किया गया।
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पशुबलि रोकने के लिए मंदिर तक जाने वाले मार्ग में भारी संख्या में गढ़वाल और कुमाऊं की पुलिस तैनात थी। भीड़ ज्यादा होने के कारण लोगों को भारी अव्यवस्था का भी सामना करना पड़ा। जैराज पुलिया से कालिंका मंदिर तक करीब 15 किमी मार्ग में सुबह से ही जाम लगना शुरू हो गया था जो कि देर शाम तक लगा रहा। मंदिर के पुजारी ने बताया कि लखौरा के कालिंका मेले के दौरान 1989 में भयंकर बर्फीला तूफान आया था। जिसकी चपेट में आने के बाद 14 लोगों की मौत हो गई थी। तब से देवी के कोप को शांत करने के लिए बलि प्रथा शुरू की गई थी, लेकिन इस बार पशु बलि की जगह नारियल की बलि से पूजा संपन्न हुई।
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