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विपणन की व्यवस्था न होने से ऊन कारोबारी परेशान

Sat, 19 Jan 2019 11:42 PM IST
Almora desk अमर उजाला ब्यूरो  बागेश्वर।
अमर उजाला ब्यूरो  बागेश्वर। Published by: Almora desk Updated Sat, 19 Jan 2019 11:42 PM IST
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Wool business bothered by lack of marketing system
बागेश्वर के भोटिया बाजार में गलीचा दिखाते व्यवसायी। - फोटो : अमर उजाला
 विपणन की ठोस व्यवस्था न होने से ऊन के कारोबारी खासे परेशान हैं। स्वयं सहायता समूहों को ब्याज पर मिलने वाले ऋण को कारोबारी अव्यवहारिक बताते हैं। उनका कहना है कि उद्यमियों का अधिकांश धन भी किराए भाड़े में चला जा रहा है। शासन-प्रशासन से मेले में उत्पादों को लाने, ले जाने, बिजली आदि की नि:शुल्क व्यवस्था करनी चाहिए।  
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उत्तरायणी मेले में धारचूला, डीडीहाट, मुनस्यारी, फरसाली और थाला आदि क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ऊनी वस्त्रों के व्यापारी आते हैं। व्यापारी अपने उत्पादों को गाड़ी बुक कराकर लाते हैं। इनमें दन, कालीन, थुलमे, आसन, पंखी, शॉल और कोट शामिल हैं। जय श्री ईष्टदेव स्वयं सहायता समूह बोनगांव (धारचूला) के संरक्षक किशन बोनाल बताते हैं कि क्षेत्र के लोगों का मुख्य कारोबार बकरीपालन करके ऊनी कारोबार करना है। इस पुुस्तैनी कारोबार से क्षेत्र के बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं। तीन गुणा तीन फीट के गलीचा तैयार करने में 15 दिन लगते हैं। करीब पांच किलो वजन के गलीचा 3500 रुपये में बिक रहा है। 
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20 दिन में बनने वाला थुलमा ढाई हजार, चुटका चार हजार रुपये, पंखी 1500, शॉल 1200, आसन पांच सौ रुपये ,वास्कट आठ सौ रुपये में बिक रहा है। बताते हैं समूह को कारोबार के लिए सात प्रतिशत ब्याज पर एक लाख रुपया मिलता है। उत्पाद तो बड़ी संख्या में तैयार हो रहे हैं लेकिन उनके विपणन की ठोस व्यवस्था नहीं है। यहां तक आने में ही सात हजार रुपया किराए भाड़ा में चला जा रहा है। शासन-प्रशासन विपणन की ठोस व्यवस्था कर दे कारोबार और भी बेहतरीन हो सकता है।
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स्थानीय स्तर और बोर्ड से होती खरीदारी
बागेश्वर। जय श्री ईष्टदेव स्वयं सहायता समूह बोनगांव (धारचूला) के संरक्षक किशन बोनाल बताते हैं कि गलीचा, थुलमा आदि के लिए क्षेत्र में ऊन मिल जाती है। अधिक जरूरत पड़ने पर खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से कच्चा ऊन 400 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिलती है। ऊन की कार्डेट के लिए धारचूला में मशीनें लगी हैं।   
 
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