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आईटीआई स्याल्दे में छह साल से तीन ट्रेड पड़े बंद
भोलाप्रकाश रिखाड़ी/अमर उजाला, भिकियासैंण (अल्मोड़ा)।
Updated Wed, 04 Feb 2015 12:08 AM IST
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एक तरफ प्रदेश सरकार राज्य में तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है लेकिन सच्चाई यह है कि दूरस्थ क्षेत्रों में तकनीकी शिक्षा मजाक बन कर रह गई है। आईटीआई स्याल्दे में चार ट्रेडों में से तीन ट्रेड छह साल से बंद पड़े हैं। एकमात्र हिंदी आशुलिपि ट्रेड में सिर्फ दस छात्र रह गए हैं। करोड़ों रुपए की लागत से आईटीआई का आलीशान भवन तो बन गया लेकिन नव निर्मित भवन में बिजली, पानी, शौचालय आदि की व्यवस्था तक नहीं है।
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तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 1988 में स्याल्दे में आईटीआई की स्थापना हुई। आईटीआई में हिंदी आशुलिपि, इलेक्ट्रॉनिक्स, वायरमैन, वेल्डर ट्रेड शुरू हुए। 2008 से इलेक्ट्रॉनिक्स, वायरमैन, वेल्डर ट्रेड बंद पड़े हैं। अब एक मात्र हिंदी आशुलिपि में पढ़ाई हो रही है। इसमें सिर्फ दस छात्र अध्ययनरत हैं। 1996 तक इस संस्थान को एनसीवीटी (नेशनल वोकेशनल ट्रेनिंग) की मान्यता थी। 2005-06 में यह मान्यता रद्द हो गई। 2005-06 में शासन ने संस्थान के भवन निर्माण को 2.39 करोड़ रुपए स्वीकृत किए। कार्यदायी संस्था जल निगम निर्माण शाखा आठ साल बाद निर्मित भवन में बिजली, पानी, शौचालय आदि की व्यवस्था नहीं कर सकी।
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दो साल पूर्व इस भवन में आईटीआई को शिफ्ट तो कर दिया गया लेकिन बिजली, पानी शौचालय की व्यवस्था नहीं होने से छात्र-छात्राओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 2011-12 में स्याल्दे आईटीआई को पीपीपी मोड पर देने का प्रस्ताव बना था लेकिन यह भी परवान नहीं चढ़ पाया। पूर्व जिला पंचायत सदस्य और सांसद प्रतिनिधि पूरन रजवार ने डीएम, कुमाऊं आयुक्त को पत्र भेजकर आईटीआई की समस्याओं का समाधान करने की मांग की है। क्षेत्रीय युवा संगठन के अध्यक्ष राकेश बिष्ट ने कहा कि समस्याओं को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। यदि जल्द समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तोे जनता को साथ लेकर आंदोलन किया जाएगा।
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पढ़ने वाला कोई नहीं लेकिन अनुदेशक नियुक्त
तकनीकी शिक्षा विभाग की भी अजीबोगरीब स्थिति है। स्याल्दे आईटीआई में ड्राइंग गणित विषय के अनुदेशक नियुक्त हैं। पर इस विषय को पढ़ने वाला कोई भी प्रशिक्षणार्थी अध्ययनरत नहीं है। टाइपिंग मशीन भी काफी पुरानी है। इसी से छात्र किसी तरह काम चला रहे हैं। फर्नीचर का भी अभाव है।