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ढोल के बिना उत्सव ही नहीं

Mon, 06 Apr 2015 11:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा Updated Mon, 06 Apr 2015 11:37 PM IST
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Not without drum festival

ढोल पर्वतीय क्षेत्र का पारंपरिक लोक वाद्य है। ढोल बैसी (22 दिन तक चलने वाला लोकोत्सव), शादी विवाह, विभिन्न मांगलिक अवसरों, जागर और  हिलजात्रा के अलावा छोलिया नृत्य आदि मौकों पर बजाया जाता है।  ढोल से बैसी लगाने वाले लोक कलाकार को जागर में अवतार लेने वाले देवता के धरमीदास ( गुरु) की संज्ञा दी जाती है।  कलाकार इस ढोल में 22 तरह के ताल बजाता है। जिससे चारों दिशाएं गूंजती है और शरीर से कंपन छूटने लगती है। बैसी लगाते वक्त धरमीदास ही देवताओं को अवतरित करवाता है। ढोल छोलिया नृत्य का भी प्रमुख वाद्य यंत्र है। कई पुराने अनुभवी ढोल वादक उल्लास के अवसरों पर ढोल बजाते वक्त नृत्य की विभिन्न और आकर्षक मुद्राओं का प्रदर्शन भी करते हैं। किसी मांगलिक कार्य के शुरू और अंत में ढोल की गति काफी तेज हो जाती है। जिसे नगाड़ा मारना कहा जाता है।  

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ढोल को विजयसार की मजबूत और पुरानी लकड़ी के दो से ढाई फीट लंबे और लगभग डेढ़ फीट व्यास के गिल्टे को अंदर से खोखला कर बनाया जाता है। यह लकड़ी पवित्र मानी जाती है। इसके बायीं पुड़ी को बकरे की पतली खाल और दूसरी ओर दायीं पुड़ी को भैंसे की खाल से बनाया जाता है। दोनों ओर के पुड़ों को मजबूत डोरी से इस तरह बांधा जाता है कि इसके कसाव को कम और ज्यादा किया जा सकता है।  यह ढोलकी से बड़ा होता है।
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चार वर्गों में बंटे वाद्य यंत्र
अल्मोड़ा। वरिष्ठ रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली के अनुसार यह मान्यता है कि वाद्य यंत्रों का प्रयोग सबसे पहले भरत मुनि ने किया। वाद्य यंत्र चार वर्गों में बंटे हैं। पहली श्रेणी में पशुओं की चमड़ी से बने वाद्य जिनमें ढोल, हुड़का, ढोलकी, दमाऊ, नगाड़ा आदि हैं। दूसरी श्रेणी में मुंह से हवा भरके बजाने वाले बांसुरी, मसकबीन आदि हैं। तीसरी श्रेणी में घन वाद्य हैं जिनमें मजीरा, कांसे की थाली, घुंघरु, चिमटा आदि आते हैं और चौथा तार रघड़कर बजाने वाले सारंगी, इकतारा, दोतारा आदि वाद्य हैं। 
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