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मानवाधिकार की कार्यशाला आयोजित
ब्यूरो, अमर उजाला ब्यूरो/ अल्मोड़ा
Updated Fri, 22 May 2015 11:58 PM IST
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उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति विजेंद्र जैन ने अल्मोड़ा जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर असंतोष जताते हुए कहा कि इस बारे में वह राज्य सरकार को सुझाव देंगे। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र में दुर्घटनाएं रोकने के लिए मोटर वाहन अधिनियम का सख्ती से पालन करने को कहा।
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अल्मोड़ा के विकास भवन में अल्मोड़ा और बागेश्वर जिले के अधिकारियों, कर्मचारियों और नागरिकों के लिए मानवाधिकार संवेदीकरण कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। न्यायमूर्ति जैन ने कहा कि अपने भ्रमण के दौरान उन्हें जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति संतोषजनक नजर नहीं आई।
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उन्होंने कहा कि इसका संज्ञान लेते हुए राज्य को शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए मोटर वाहन अधिनियम सख्ती के साथ लागू करना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की अंधी दौड़ में मानवाधिकारों को स्थापित करने में अनेक अड़चनें आती हैं।
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इसके लिए हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज और व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी को निर्धारित नियमों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए। आयोग के सदस्य और उत्तराखंड हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश टंडन ने मानवाधिकारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों को पुलिस और राजस्व पुलिस को एएफआईआर दर्ज करने में प्राथमिकता देनी चाहिए। जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन और एसपी केएस नगन्याल ने कहा कि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन किया जाएगा।
पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने आम लोगों को मानवाधिकारों के लिए जागरूक करने पर जोर दिया। इस अवसर पर कई लोगों ने स्वास्थ्य, ट्रैफिक व्यवस्था, पुलिस उत्पीड़न, मलिन बस्ती आवास निर्माण, पालिका के सेवानिवृत्त कर्मियों का भुगतान करने सहित मानवाधिकारों से संबंधित मुद्दे उठाए और उनका पालन कराने की मांग की।
इस मौके पर छावनी परिषद के उपाध्यक्ष जंग बहादुर थापा, पीसी तिवारी, कैप्टन जेके पंत, कमला जोशी, कमल कपूर, ग्रास संस्था के गोपाल सिंह चौहान आदि ने मुद्दे उठाए। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने बताया कि संविधान में दिए गए सभी मौलिक अधिकार मानवाधिकार की श्रेणी में आते हैं।
इनमें खास तौर पर बाल श्रम, बच्चों का अवैध व्यापार, बच्चों की गुमशुदगी की बढ़ती घटनाएं, बच्चों का शारीरिक शोषण, यौन हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, बेसहारा महिलाओं का पुनर्वास, पैतृक संपत्ति में महिलाओं का अधिकार, बंधुवा मजदूरी, स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार सहित कई अन्य मुद्दे शामिल हैं।
शिकायत के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। लोग आवेदन पत्रों के अलावा ई-मेल से भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।