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बरबादी की कगार पर है चौबटिया का सेब गार्डन
ब्यूरो /अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
Updated Tue, 08 Sep 2015 10:43 PM IST
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नीति निर्धारकों की घोर लापरवाही के चलते चौबटिया का प्रख्यात सेब गार्डन बरबादी के कगार पर है। 106.91 हेक्टेयर भूमि में फैले उद्यान में सेब का उत्पादन निरंतर गिर रहा है।
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इस बार कुल 20 क्विंटल सेब का उत्पादन हुआ है। बाहर तो दूर की बात रानीखेत नगरवासियों को ही सेब चखने तक को नसीब नहीं है। नगर में भी अधिकांश हिमाचल का सेब ही बिक रहा है।
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दरअसल नीति नियंताओं को अधिक मुनाफे के लिए स्वदेशी सेब की प्रजाति को हटाकर अमेरिकन सेब की प्रजाति का उत्पादन करना महंगा पड़ गया।
अब फिर से विभाग को स्वदेशी सेब की याद आई है। इस बार उद्यान में 25 सौ स्वदेशी प्रजाति के सेब के पेड़ लगाए गए हैं।
चौबटिया में उद्यान निदेशालय की स्थापना 1953 में हुई। 106.91 हेक्टेयर भूमि में फैले इस प्रख्यात उद्यान में स्वदेशी डेलीसेस प्रजाति के सेबों का उत्पादन किया गया।
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चौबटिया में उत्पादित होने वाले इस सेब की लालिमा यूरेपियन देशों तक प्रसिद्ध थी। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि भी इस प्रजाति को ही उत्पादित करते थे।
एक दशक से उद्यान में सेब के उत्पादन में गिरावट आ रही है। पिछली बार यहां साढ़े 14 क्विंटल तो इस बार 20 क्विंटल सेब का उत्पादन हुआ है।
हालांकि उत्पादन गिरने के पीछे तापमान अधिक होने और पेड़ों के उम्रदराज होने की बात कही जा रही है, लेकिन उद्यान की दुर्गति के लिए निति नियंता ही कुसूरवार हैं।
यहां सात साल पूर्व स्वदेशी प्रजाति के सैकड़ों पेड़ों को काटकर करोड़ों रुपये की लागत वाले अमेरिकन सेब की प्रजाति के पौधे लगाए गए।
बताते हैं कि अमेरिकन प्रजाति के एक पौधे की ट्रांसपोर्टिंग लागत ही चार सौ रुपेा थी, लेकिन यह प्रजाति यहां पूरी तरह से फेल हो गई।
गार्डन में वर्तमान में पुराने डेलीसेस के 50 से 60 पेड़ बचे हैं, अधिकारियों का कहना है कि पेड़ उम्रदराज हो गए हैं जिसके चलते उत्पादन गिर रहा है।