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इन हालातों के लिए प्रकृति से ज्यादा हम जिम्मेदार : बिष्ट
Updated Mon, 14 Aug 2017 11:08 PM IST
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चौखुटिया (अल्मोड़ा)। सेवानिवृत्त इतिहास प्रवक्ता बुजुर्ग नंदन सिंह बिष्ट (87) का कहना है कि पहले जमाने में भूस्खलन की इतनी घटनाएं नहीं होती थीं। बादल फटने जैसी घटनाएं तो पिछले कुछ सालो में ही सुनने में आ रही हैं। फिर विकास के नाम पर पहाड़ों का सीना चीरने, लोगों की बसासत का ढंग, जीवन शैली में बदलाव और पहाड़ों और पेड़ों के बेतरतीब कटान ने स्थितियां और विकट बना दी हैं।
बढ़ते भूस्खलन और इससे लगातार हो रहे नुकसान को लेकर इतिहास के अच्छे जानकार ग्राम ढौन निवासी बुजुर्ग नंदन सिंह बिष्ट का कहना है कि पहले जनसंख्या काफी कम थी। पुराने लोग नदी-नालों से दूर सुरक्षित पहाड़ियों पर मकान बनाते थे। इसलिए भूस्खलन से मकानों के टूटने या लोगों के दबने की घटनाएं नही होती थी। इधर, जनसंख्या का अनुपात बढ़ता गया और लोग सड़क के पास बसने के चक्कर में तेजी से गाड़-गधेरों के पास मकान बनाने लगे।
चौखुटिया घाटी में ही निजी तो दूर कुछ सरकारी भवन तक नदी-गधेरों के पास बने हैं। नदी-गधेरों में बाढ़ पहले भी आती थी, लेकिन आज मकान नदियों के पास हैं तो नुकसान होना स्वाभाविक है। जहां तक बादल फटने की घटनाओं का सवाल है यह पहले सुनने को नहीं मिलता था। कुछ वर्षों से ही यह बातें सामने आ रही हैं। बिष्ट बताते हैं कि भूस्खलन के लिए प्रकृति से ज्यादा हम जिम्मेदार हैं। पेड़ों के ताबड़तोड़ कटान के साथ ही सड़क निर्माण के नाम पर बड़ी मशीनों से पहाड़ों का अनियोजित कटान इसका बड़ा कारण है। आज स्थिति यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में यात्रा करना भी जोखिम भरा हो गया है।
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बढ़ते भूस्खलन और इससे लगातार हो रहे नुकसान को लेकर इतिहास के अच्छे जानकार ग्राम ढौन निवासी बुजुर्ग नंदन सिंह बिष्ट का कहना है कि पहले जनसंख्या काफी कम थी। पुराने लोग नदी-नालों से दूर सुरक्षित पहाड़ियों पर मकान बनाते थे। इसलिए भूस्खलन से मकानों के टूटने या लोगों के दबने की घटनाएं नही होती थी। इधर, जनसंख्या का अनुपात बढ़ता गया और लोग सड़क के पास बसने के चक्कर में तेजी से गाड़-गधेरों के पास मकान बनाने लगे।
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चौखुटिया घाटी में ही निजी तो दूर कुछ सरकारी भवन तक नदी-गधेरों के पास बने हैं। नदी-गधेरों में बाढ़ पहले भी आती थी, लेकिन आज मकान नदियों के पास हैं तो नुकसान होना स्वाभाविक है। जहां तक बादल फटने की घटनाओं का सवाल है यह पहले सुनने को नहीं मिलता था। कुछ वर्षों से ही यह बातें सामने आ रही हैं। बिष्ट बताते हैं कि भूस्खलन के लिए प्रकृति से ज्यादा हम जिम्मेदार हैं। पेड़ों के ताबड़तोड़ कटान के साथ ही सड़क निर्माण के नाम पर बड़ी मशीनों से पहाड़ों का अनियोजित कटान इसका बड़ा कारण है। आज स्थिति यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में यात्रा करना भी जोखिम भरा हो गया है।
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