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बदलने लगा है गांव की सादगी भरी दीपावली का मिजाज
Updated Fri, 20 Oct 2017 10:47 PM IST
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चौखुटिया (अल्मोड़ा)। गांव की सादगी भरी दीपावली भी अब चकाचौंध में बदलने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले दीपावली के महापर्व पर शहर की दीपावली का प्रभाव पड़ने लगा है। महंगे पटाखे और मिठाइयां अब आम बात हो गई है। अलबत्ता अपवादों को छोड़ इस त्यौहार पर लोगों का बड़े उत्साह से अपने गांव आने का क्रम जारी है।
किसी जमाने में गावों में दीपावली के पर्व पर लोग घास गोबर को मिलाकर कैरोसीन में भिगोकर अथवा रुई और धान के छिलके को कैरोसीन में भिगोकर बड़े उत्साह से जलाकर दीपावली मनाते थे। गांव कस्बों में जुए के कई फड़ लगते थे। मिठाई के नाम पर खिलौने, खील और बताशों के अलावा पेठा, जिसे स्थाई लोग भूजे की मिठाई कहते हैं तथा बूंदी-बेसन के लड्डू तक सीमित थे।
जबकि बच्चे पटाखों के नाम पर फुलझड़ी, हथगोले, रेल अनार, घनचक्री (चर्खी) तक सीमित थे, परंतु अब महंगे पटाखे, डिब्बाबंद मिठाई बिजली से संचालित लड़ियां आदि का प्रचलन खूब बढ़ गया है। यह अच्छी बात है कि आज भी बाहर रहने वाले अधिकांश लोग बड़े उत्साह से दीपावली पर घर आते हैं। घर के लोगों को भी दीवाली पर अपने परिजनों का बेसब्री से इंतजार रहता है।
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किसी जमाने में गावों में दीपावली के पर्व पर लोग घास गोबर को मिलाकर कैरोसीन में भिगोकर अथवा रुई और धान के छिलके को कैरोसीन में भिगोकर बड़े उत्साह से जलाकर दीपावली मनाते थे। गांव कस्बों में जुए के कई फड़ लगते थे। मिठाई के नाम पर खिलौने, खील और बताशों के अलावा पेठा, जिसे स्थाई लोग भूजे की मिठाई कहते हैं तथा बूंदी-बेसन के लड्डू तक सीमित थे।
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जबकि बच्चे पटाखों के नाम पर फुलझड़ी, हथगोले, रेल अनार, घनचक्री (चर्खी) तक सीमित थे, परंतु अब महंगे पटाखे, डिब्बाबंद मिठाई बिजली से संचालित लड़ियां आदि का प्रचलन खूब बढ़ गया है। यह अच्छी बात है कि आज भी बाहर रहने वाले अधिकांश लोग बड़े उत्साह से दीपावली पर घर आते हैं। घर के लोगों को भी दीवाली पर अपने परिजनों का बेसब्री से इंतजार रहता है।
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