तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिलकर बनेगी प्रीत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गंगा किनारे बालाजी घाट के नौबतखाने में रियाज करने वाले उस्ताद की यादें अब भी लोगों के जेहन ताजा हैं। सौवें जन्मदिन पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार काशी में संगीत महोत्सव ‘सुर बनारस’ के जरिए शहनाई के जादूगर को याद करने जा रही है। इसे लेकर चार दिन का महोत्सव शनिवार से नागरी नाटक मंडली में शुरू होगा। सोमा इस महोत्सव में गाएंगी। उनका कहना है कि बाबा ने अंतिम समय में भी उनसे सिर्फ सुर की चर्चा की थी। वह सुरों की तासीर को बचाए रखना चाहते थे। अब वह खुशबू संगीत के साधकों में कम नजर आती है।
पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र कहते हैं कि उस्ताद में कुदरती दमकशी थी। वह हमेशा सुर में रहे। उनकी शहनाई में पुकार थी।
उनकी सांस में जो जान थी, वैसी वजनदारी कहीं नहीं दिखती। उनके जीते जी नई पीढ़ी के कलाकार उनसे वो सुर लगाने की बारीकी नहीं सीख सके। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बाद शहनाई की विरासत खतरे में पड़ गई है। वह भी एक दौर था जब उस्ताद थे और दिलोजान से बढ़कर उनकी शहनाई। जिसे वह अपने सिरहाने रखकर सोते भी रहे और जागते भी।
सराय हड़हा के लोग बताते हैं कि तब दिन हो या रात भीखा शाह गली से गुजरने पर शहनाई की कशिश सुनाई देती थी।
अब तो लोग वो घर भी भूलने लगे हैं। विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में उस्ताद ने ही शहनाई पर सुर दिया था। जीवन में पिया तेरा साथ रहे..., दिल का खिलौना हाय टूट गया... जैसे गीतों पर उस्ताद की शहनाई बजी। फिल्म स्वदेश, फिर बाजे शहनाई और भोजपुरी फिल्म अंगना में बजे शहनाई में उस्ताद के सुर अब भी लोग बार-बार सुनने के लिए बेताब रहते हैं।