{"_id":"5a33a17a4f1c1ba7668ba3d8","slug":"varanasi-varuna-river-going-to-die","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"तीन दशक में मिटने के कगार पर पहुंच गई वाराणसी की ‘जीवन रेखा’ ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
तीन दशक में मिटने के कगार पर पहुंच गई वाराणसी की ‘जीवन रेखा’
amarujala.com- Written by: जयनारायण सिंह यादव
Updated Fri, 15 Dec 2017 03:48 PM IST
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जिसने सींचीं बनारस की सदियां-पीढ़ियां , आज खुद की बुझा नहीं पा रही है प्यास
- फोटो : अमर उजाला
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अरी वरुणा की शांत कछार/ तपस्वी के वीराग की प्यार/ सतत व्याकुलता के विश्राम/ अरे ऋषियों के कानन कुंज/ जगत नश्वरता के लघु त्राण/ लता पादप सुमनों के पुंज/ अरी वरुणा की शांत कछार..। महाकवि जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियां वरुणा नदी के पुराने पुल की दीवारों पर उकेरी गई हैं। प्रसाद ने अपनी रचना में जिस वरुणा का इतना सुंदर वर्णन किया है, वर्तमान में न तो वरुणा की वह शांत कछार रही और न ही कलकल करता निर्मल जल। अतिक्रमण के कारण असि नदी का अस्तित्व पहले ही समाप्तप्राय: हो चुका है।
सदियों से वाराणसी की पहचान रही वरुणा नदी के स्वरूप पर गुजरे तीन दशक भारी पड़ गए। 27 साला में हालात ऐसे हो गए कि जो वरुणा कभी गर्मी में भी कल-कल बहा करती थी, वह अब जाड़े की शुरुआत के साथ ही सूख गई है। शहरी क्षेत्र में इसमें पानी के नाम पर सीवेज और गाद के अलावा कुछ नहीं बचा है।
विस्तार लेते शहर और तेजी से बढ़ती आबादी के बीच बेतहाशा अवैध निर्माणों से वरुणा नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
जिम्मेदार विभागों के अफसरों और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से नदी का वजूद सिकुड़ता चला गया। उसके प्राकृतिक स्वरूप की अनदेखी कर कई जगह तलहटी तक अवैध निर्माण करा दिए गए। आदिकेशव सराय मोहाना स्थित गंगा-वरुणा संगम स्थल पर तो सीवेज की दुर्गंध से खड़े होना मुश्किल है।
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यही हाल वहां से लेकर शिवपुर तक है। सराय मोहाना के संगम स्थल से लेकर शिवपुर तक वरुणा सिकुड़ी हुई है। दोनों किनारों पर नदी का कछार कब्जा कर कुछ लोग सरसों, गेहूं और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। नक्खी घाट, चौकाघाट के पास तो नदी की तलहटी तक में कब्जा हो गया है। नदी का स्वरूप नाले जैसा हो गया है।
झोपड़ियां ही नहीं, घौसाबाद से चौकाघाट के बीच कई जगह बहुमंजिली इमारतें और रिहायशी भवन बन गए हैं। सराय मोहाना के बाद कोनिया, किलाकोहना, पुरानापुल और नक्खीघाट के समीप नदी के दोनों किनारों पर डूब क्षेत्र के कुछ बचे हिस्से में अधिकारियों की अनदेखी से निर्माण हो रहे हैं।
खासकर कैंटोनमेंट से शिवपुर के बीच नदी के डूब क्षेत्र पर अवैध निर्माण और भू-माफिया के कब्जे ने हालत बदतर कर दी है। क्षेत्र के बुजुर्गों के मुताबिक 1990 से पहले वरुणा में बारह महीने प्रवाह बना रहता था। तब नहाने-धोने के साथ ही पेयजल के रूप में भी इसके पानी का इस्तेमाल होता था।
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सदियों से वाराणसी की पहचान रही वरुणा नदी के स्वरूप पर गुजरे तीन दशक भारी पड़ गए। 27 साला में हालात ऐसे हो गए कि जो वरुणा कभी गर्मी में भी कल-कल बहा करती थी, वह अब जाड़े की शुरुआत के साथ ही सूख गई है। शहरी क्षेत्र में इसमें पानी के नाम पर सीवेज और गाद के अलावा कुछ नहीं बचा है।
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विस्तार लेते शहर और तेजी से बढ़ती आबादी के बीच बेतहाशा अवैध निर्माणों से वरुणा नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
जिम्मेदार विभागों के अफसरों और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से नदी का वजूद सिकुड़ता चला गया। उसके प्राकृतिक स्वरूप की अनदेखी कर कई जगह तलहटी तक अवैध निर्माण करा दिए गए। आदिकेशव सराय मोहाना स्थित गंगा-वरुणा संगम स्थल पर तो सीवेज की दुर्गंध से खड़े होना मुश्किल है।
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यही हाल वहां से लेकर शिवपुर तक है। सराय मोहाना के संगम स्थल से लेकर शिवपुर तक वरुणा सिकुड़ी हुई है। दोनों किनारों पर नदी का कछार कब्जा कर कुछ लोग सरसों, गेहूं और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। नक्खी घाट, चौकाघाट के पास तो नदी की तलहटी तक में कब्जा हो गया है। नदी का स्वरूप नाले जैसा हो गया है।
झोपड़ियां ही नहीं, घौसाबाद से चौकाघाट के बीच कई जगह बहुमंजिली इमारतें और रिहायशी भवन बन गए हैं। सराय मोहाना के बाद कोनिया, किलाकोहना, पुरानापुल और नक्खीघाट के समीप नदी के दोनों किनारों पर डूब क्षेत्र के कुछ बचे हिस्से में अधिकारियों की अनदेखी से निर्माण हो रहे हैं।
खासकर कैंटोनमेंट से शिवपुर के बीच नदी के डूब क्षेत्र पर अवैध निर्माण और भू-माफिया के कब्जे ने हालत बदतर कर दी है। क्षेत्र के बुजुर्गों के मुताबिक 1990 से पहले वरुणा में बारह महीने प्रवाह बना रहता था। तब नहाने-धोने के साथ ही पेयजल के रूप में भी इसके पानी का इस्तेमाल होता था।
पहले वरुणा बचाएं, फिर कॉरिडोर बनाएं
अवैध कब्जे हटवाकर नदी के प्राकृत स्वरूप को बहाल करना जरूरी
- फोटो : अमर उजाला
वरुणा कॉरिडोर योजना में भी नदी संरक्षण के प्रयासों से अधिक इसके सौंदर्यीकरण पर ध्यान दिया गया। जबकि, नदी विशेषज्ञों का कहना है कि वरुणा को जीवित रखने के लिए सबसे जरूरी है कि पहले अवैध कब्जे हटवाकर नदी में सीवेज का गिरना रोका जाए। उसके प्राकृतिक स्वरूप को संरक्षित किया जाए। साथ ही, लिफ्ट कैनालों के जरिए नदी में साफ पानी का प्रवाह सुनिश्चित कराया जाए।
सिंचाई विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि तीन दशक पहले तक इलाहाबाद के मैनहट्टन ताल के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के कई छोटे-बड़े नालों से पानी वरुणा में आता था। समय के साथ इनमें कई नालों के अस्तित्व समाप्त हो गए और शहरी क्षेत्र में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की व्यवस्था न होने से नदी में पानी की जगह सीवेज का दबाव बढ़ता चला गया।
नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि वरुणा के प्राकृतिक स्वरूप को बहाल कराए बगैर कॉरिडोर के निर्माण का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। नदी में नालों से गिर रहा सीवर रोका जाए। साथ ही, इसकी ड्रेजिंग कराने के बाद ज्ञानपुर पंप कैनाल सहित जो भी वैकल्पिक माध्यम हैं उनके जरिए इसका निरंतर प्रवाह सुनिश्चित कराया जाए।
26 दिसंबर को छोड़ा जाएगा पानी
सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार 26 दिसंबर को गंगा से पानी लिफ्ट कराके वरुणा में छोड़ने की योजना है। गंगा से वरुणा तक पानी पहुंचने में 55 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। हंडिया इलाहाबाद के केहुनी पंप हाउस से ज्ञानपुर मुख्य नहर के जरिए 43 किमी दूरी तय करके पानी भाला घाट पहुंचता है। यहां से तीन किमी दूरी स्थित कनेरी स्केप के जरिए पानी मोरवा ड्रेन में भेजा जाता है।
वहां से नौ किमी दूरी तय करते हुए पानी वरुणा नदी में पहुंचता है। इस प्रक्रिया में दो दिन लग जाते हैं। यहां से सरायमोहाना स्थित वरुणा-गंगा संगम तक पानी पहुंचने में 25 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। डीएम बंगला से सरायमोहना के बीच कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।
सिंचाई विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि तीन दशक पहले तक इलाहाबाद के मैनहट्टन ताल के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के कई छोटे-बड़े नालों से पानी वरुणा में आता था। समय के साथ इनमें कई नालों के अस्तित्व समाप्त हो गए और शहरी क्षेत्र में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की व्यवस्था न होने से नदी में पानी की जगह सीवेज का दबाव बढ़ता चला गया।
नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि वरुणा के प्राकृतिक स्वरूप को बहाल कराए बगैर कॉरिडोर के निर्माण का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। नदी में नालों से गिर रहा सीवर रोका जाए। साथ ही, इसकी ड्रेजिंग कराने के बाद ज्ञानपुर पंप कैनाल सहित जो भी वैकल्पिक माध्यम हैं उनके जरिए इसका निरंतर प्रवाह सुनिश्चित कराया जाए।
26 दिसंबर को छोड़ा जाएगा पानी
सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार 26 दिसंबर को गंगा से पानी लिफ्ट कराके वरुणा में छोड़ने की योजना है। गंगा से वरुणा तक पानी पहुंचने में 55 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। हंडिया इलाहाबाद के केहुनी पंप हाउस से ज्ञानपुर मुख्य नहर के जरिए 43 किमी दूरी तय करके पानी भाला घाट पहुंचता है। यहां से तीन किमी दूरी स्थित कनेरी स्केप के जरिए पानी मोरवा ड्रेन में भेजा जाता है।
वहां से नौ किमी दूरी तय करते हुए पानी वरुणा नदी में पहुंचता है। इस प्रक्रिया में दो दिन लग जाते हैं। यहां से सरायमोहाना स्थित वरुणा-गंगा संगम तक पानी पहुंचने में 25 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। डीएम बंगला से सरायमोहना के बीच कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।
... मगर विशेषज्ञों की कर दी अनदेखी
दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ खेतों की सिंचाई पर संकट
- फोटो : अमर उजाला
कॉरिडोर की शुरुआत डेढ़ साल पहले जब हुई थी तब ही नदी विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि ड्रेजिंग शुरू कराने से पहले सीवेज का गिरना रोका जाए लेकिन कार्यदायी संस्थाओं ने उनकी सलाह को कोई तरजीह नहीं दी। मनमाने तरीके से ड्रेजिंग शुरू करा दी। एक ओर सफाई होती गई, दूसरी ओर सीवेज गिरने से गाद भरती गई। नतीजा कुछ नहीं निकला। अलबत्ता ड्रेजिंग के नाम पर लाखों रुपये खप गए।
हालांकि शासन के हस्तक्षेप से सीवर रोकने के लिए नदी के दोनाें तरफ इंटरसेप्टर लाइन डालने का काम शुरू कराया जा चुका है। वरुणा में गिरने वाले 14 नालों को इस इंटरसेप्टर लाइन से जोड़ा जाएगा। यह इंटरसेप्टर लाइन गोइठहां और दीनापुर एसटीपी से जुड़ेगी।
इन्होंने ये कहा
गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई जल निगम के परियोजना प्रबंधक एसके वर्मन ने कहा कि वरुणा में गिरने वाले नालों को रोकने के लिए गोइठहां और दीनापुर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम जारी है। जनवरी तक उसे पूरा करा लिया जाएगा।
वरुणा में गिरने वाले नालाें के सीवेज को लिफ्ट करने के लिए चौकाघाट, फुलवरिया में सीवेज पंपिंग स्टेशन का काम पूरा हो चुका है। सीवेज पाइप लाइन बिछाने का काम भी हो चुका है। सीवेज प्लांट चालू होते ही वरुणा में नालों का गिरना बंद हो जाएगा।
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता केएन जायसवाल ने कहा कि रोस्टर के अनुसार 26 दिसंबर से पानी छोड़ा जाना है। इसके पहले नहरों में पानी छोड़ा जाएगा। तय व्यवस्था के तहत पहले किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता है।
हालांकि शासन के हस्तक्षेप से सीवर रोकने के लिए नदी के दोनाें तरफ इंटरसेप्टर लाइन डालने का काम शुरू कराया जा चुका है। वरुणा में गिरने वाले 14 नालों को इस इंटरसेप्टर लाइन से जोड़ा जाएगा। यह इंटरसेप्टर लाइन गोइठहां और दीनापुर एसटीपी से जुड़ेगी।
इन्होंने ये कहा
गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई जल निगम के परियोजना प्रबंधक एसके वर्मन ने कहा कि वरुणा में गिरने वाले नालों को रोकने के लिए गोइठहां और दीनापुर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम जारी है। जनवरी तक उसे पूरा करा लिया जाएगा।
वरुणा में गिरने वाले नालाें के सीवेज को लिफ्ट करने के लिए चौकाघाट, फुलवरिया में सीवेज पंपिंग स्टेशन का काम पूरा हो चुका है। सीवेज पाइप लाइन बिछाने का काम भी हो चुका है। सीवेज प्लांट चालू होते ही वरुणा में नालों का गिरना बंद हो जाएगा।
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता केएन जायसवाल ने कहा कि रोस्टर के अनुसार 26 दिसंबर से पानी छोड़ा जाना है। इसके पहले नहरों में पानी छोड़ा जाएगा। तय व्यवस्था के तहत पहले किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता है।