वाराणसी: असम के राज्यपाल बोले- राही मासूम रजा की रचनाएं भारतीय संस्कृति की साझी विरासत हैं; विमर्श
असम के राज्यपाल ने कहा कि राही मासूम रजा की रचनाएं भारतीय संस्कृति की साझी विरासत हैं। उनके साहित्य में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विविधता और मानवीय मूल्यों की झलक मिलती है। राही मासूम रजा के साहित्यिक योगदान और विचारों को लेकर आयोजित विमर्श में उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता पर चर्चा की गई।
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बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय स्थित पं. ओंकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में सोमवार को प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राही मासूम रजा के जन्म शताब्दी वर्ष पर आयोजित ‘भारत-बोध के राही’ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि असम के राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने कहा कि राही मासूम रजा की रचनाएं भारतीय संस्कृति की साझी विरासत और सामाजिक यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
उन्होंने कहा कि भारत रत्न भूपेन हजारिका और राही मासूम रजा का जन्म शताब्दी वर्ष भारतीय सांस्कृतिक चेतना और विविधता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह आयोजन महामना मदन मोहन मालवीय के भारत-बोध के प्रति भी श्रद्धांजलि है। राही मासूम रजा का साहित्य बताता है कि लेखक अपने समय के प्रश्नों को समझने और उन्हें समाज के सामने रखने का साहस रखता है। उनकी रचनाओं में मिट्टी की खुशबू, सामाजिक यथार्थ और लोकजीवन के सरोकार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यकार अपने समय के समाज और उसकी चुनौतियों को मुखर स्वर देते हैं।
अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने आयोजकों को सांस्कृतिक स्मृतियों को सहेजने की पहल के लिए बधाई दी। कहा कि राही मासूम रजा जैसे साहित्यकारों और महापुरुषों के योगदान को निरंतर याद करते रहना जरूरी है।
इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक केजी सुरेश ने कहा कि राही मासूम रजा ने भारतीय संस्कृति और विरासत को आत्मसात किया था। महाभारत धारावाहिक के माध्यम से उन्होंने भारतीय विरासत और संस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई। उनका उपन्यास ‘आधा गांव’ साझी विरासत के खोने की पीड़ा और सामाजिक यथार्थ का सशक्त चित्रण है।
भारतीय शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन एनपी सिंह ने कहा कि सृजनधर्मियों की मृत्यु नहीं होती, उनकी रचनाएं उन्हें अमर बनाती हैं। राही ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आगाह किया कि विभाजन की मानसिकता समाज और देश को अलग-अलग खेमों में बांटती है।