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स्वामी सानंद ने बीएचयू से किया था बीएससी, गंगा के लिए आंदोलन से बनाई थी दिल में जगह

Fri, 12 Oct 2018 01:20 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Fri, 12 Oct 2018 01:20 PM IST
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swami sanand has strong relation from varanasi
प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र के साथ स्वामी सानंद - फोटो : file photo
गंगा की अविरलता-निर्मलता के लिए जीवन भर संघर्ष करने वाले स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद उर्फ प्रो. जीडी अग्रवाल का काशी से गहरा जुड़ाव रहा था। बीएचयू से बीएससी करने के साथ ही वह समय-समय पर यहां आकर गंगा की स्वच्छता के लिए काम करने वालों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। रिहंद बांध प्रोजेक्ट पर काम करने वाली टीम के अहम सदस्य प्रो. अग्रवाल के टेक्नोक्रेट होते भी हुए गंगा के प्रति समर्पण ने सबके दिल में जगह बनाई थी। गुरुवार  दोपहर बाद उनके निधन की सूचना मिलते ही उनके परिचित शोक में डूब गए।
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पढ़ेंः गंगा के लिए ऐसे करते रहे काम, स्वामी सानंद ने काशी में कहा था- ऐसे जीने से क्या फायदा

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स्वामी सानंद के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर और संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि उन्होंने ऐसी कोई मांग नहीं रखी थी, जिसे माना नहीं जा सकता था। सरकार गंगा की अविरलता-निर्मलता के लिए बातें खूब करती है लेकिन इस मामले में अनदेखी की गई। सरकार ध्यान देती तो ये दिन सामने नहीं आता। उन्होंने याद किया कि पिता प्रो. वीरभद्र मिश्र को समय-समय पर उनका सानिध्य और मार्गदर्शन मिलता था। संकट मोचन फाउंडेशन की ओर से चलाए जा रहे अभियान में भी वह अपना अमूल्य सहयोग देते थे।
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संकट मोचन फाउंडेशन के चेयरपर्सन प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि  गंगा विशेषज्ञ स्वामी सानंद ने काशी से उत्तराखंड तक गंगा के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी। उनके निधन के बाद गंगा के लिए चलाया जा रहा अभियान रुकने वाला नहीं है। इसे और गति मिलना तय है। 

जल विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी ने कहा कि गंगा की अविरलता के लिए स्वामी सानंद निरंतर काम कर रहे थे। उनके जाने से अभियान को क्षति पहुंचेगी। उनके निधन से हम सभी दुखी हैं। गंगा के लिए उनका यह त्याग सभी का मार्गदर्शन करेगा। 

2011 में यहीं लिया संन्यास और 2012 में किया था अनशन

काशी में गंगा को अविरल बनाने के लिए कई बार उन्होंने सरकार से वार्ता की थी। बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलने और सरकार के उदासीन रवैये से क्षुब्ध होकर स्वामी सानंद 22 अप्रैल को यहां आए थे। कहा था, अब कोई आशा नहीं है कि सरकार की ओर से इस दिशा में प्रयास किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने गंगा की गंदगी पर चिंता जताने के साथ ही गंगा की अविरलता के लिए आंदोलन चलाने वालों से भी बातचीत की थी।

साफ तौर पर चेताया था कि अगर सभी लोग एकजुट नहीं हुए तो आने वाले दिनों में गंगा की पहचान मिट जाएगी। इसी दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि जब मां के आंचल को साफ नहीं करा सका तो ऐसे जीने से क्या फायदा, अब देह त्याग दूंगा।

प्रो. अग्रवाल का मन जब विज्ञान से हटकर धर्म और अध्यात्म की तरफ मुड़ा तो वह शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के पास पहुंचे। शंकराचार्य ने उन्हें अपने शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास दीक्षा ग्रहण करने के लिए भेज दिया। स्वामी सानंद ने तीन जुलाई, 2011 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा ग्रहण करने के बाद प्रो. अग्रवाल स्वामी सानंद बन गए।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि स्वामी सानंद का जीवन सिर्फ एक कपड़े पर चलता रहा। दीक्षा के समय उन्होंने स्वामी सानंद को एक पीला वस्त्र दिया था, जो वह आजीवन पहनते रहे। स्वामी सानंद ने मार्च, 2012 में गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए काशी में अनशन किया था। लगभग सात दिन चले अनशन के दौरान उनके गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अलावा यूपीए सरकार के कई मंत्री काशी आए और उन्होंने उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया था।
 

स्वामी सानंद के गुरु ने लगाया हत्या का आरोप

स्वामी सानंद के गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि उनकी मौत नहीं हुई है, उनकी हत्या की गई है। सीबीआई जांच की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद पार्थिव शरीर बीएचयू के चिकित्सा संस्थान को सौंप देना चाहिए। 111 दिन तपस्या करते हुए आश्रम में वह स्वस्थ थे। अस्पताल में पहुंच कर एक रात बाद उनकी मृत्यु से प्रतीत होता है कि उनकी हत्या हुई है।
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