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स्पेशल रिपोर्टः सीएम और डिप्टी सीएम के बाद अब पूर्वांचल को चाहिए ‘ ए बी सी डी’

Thu, 23 Mar 2017 05:34 PM IST
amarujala.com- Written by : प्रदीप मिश्र
amarujala.com- Written by : प्रदीप मिश्र Updated Thu, 23 Mar 2017 05:34 PM IST
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special report: now need of abcd in purvanchal after cm and dupty cm
जनता ने वोट तो बरसाए पर सरकारों ने आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर नहीं दिया ध्यान - फोटो : अमर उजाला
महंत आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री और फूलपुर के केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद पूर्वांचल की बल्ले-बल्ले तो हो गई है। मंत्रिमंडल में भी पर्याप्त महत्व मिला है लेकिन राजनीतिक रूप से सतर्क (अवेयर) पूर्वांचल का हर वर्ग नई सरकार से ऐसे प्रयासों और उपायों की उम्मीद कर रहा है, जिससे यहां की बेरोजगारी कम करने के लिए आधारभूत ढांचे का विकास किया जाए।
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यहां के बाशिंदे प्रशासनिक सक्रियता (एक्टिव ब्यूरोक्रेसी) के अलावा भ्रष्टाचारमुक्त विकास (करप्शन-फ्री डेवलपमेंट) चाहते हैं। जानकारों की चिंता यहां के पिछड़ेपन (बैकवर्डनेस), संगठित अपराध (क्राइम) और जातीय जोड़तोड (कास्ट फैक्टर) को लेकर भी है।
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पूर्वांचल की सबसे बड़ी समस्या यहां की नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) कार्रवाई (एक्टिव) करने वाली नहीं है। अब तक यहां केंद्र और राज्य के अलावा एक ही विभागों में आपसी समन्वय (कोआर्डिनेशन) की कमी रही है। ऐसे में यहां का अनुशासन और व्यवस्था (डिसिप्लिन एंड डेकोरम) ध्वस्त हो चुका है। इसी का नतीजा है कि सड़क, बिजली और पानी के साफ पानी जैसी बुनियादी समस्याओं से यहां के लोग रोजाना दो-चार हो रहे हैं। 
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पूर्वांचल का यह सर्वज्ञात पक्ष है कि यहां के लोग राजनीतिक रूप से परिपक्व हैं और वे हमेशा सही फैसला करते रहे हैं। 2007 में इस पूरी बेल्ट ने बसपा का साथ दिया था तो उम्मीदें पूरी न होने पर 2012 में सपा को हाथोंहाथ लिया।

अब तक की सरकारें यहां के संसाधनों का दोहन तो करती रही हैं, पर मतदाताओं का मान कभी नहीं रखा गया। भाजपा नेतृत्व ने चुनाव के पहले ही पूर्वांचल के ‘ मन की बात’ को पढ़ लिया और अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (भासपा) से तालमेल कर आजमगढ़ के अलावा ज्यादातर जिलों में सपा-बसपा का सूपड़ा साफ कर दिया।

चुनाव के परिणाम साबित करते हैं कि पूर्वांचल की जनता ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अलग-अलग परिभाषाओं और व्याख्याओं से ऊब कर भाजपा को एकमुश्त वोट दिए हैं। 


वैसे यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि पूर्ववर्ती सपा सरकार ने विकास की जो परिभाषाएं गढीं, वे सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकीं। इसीलिए लोगो ने ‘प्रैगमैटिज्म’ यानी व्यवहारिक आधार पर वोट दिया।

बहरहाल ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे और पूर्वांचल विकास बोर्ड की स्थापना के वादे पर पर बनी सरकार से लोग ‘गुड गवर्नेंस’ के तहत प्राथमिक तौर पर कामकाज में पारदर्शिता आने और गुंडाराज से मुक्ति की अपेक्षा रखते हैं। 

विषय विशेषज्ञों द्वारा गौर करने लायक महत्वपूर्ण सुझाव

special report: now need of abcd in purvanchal after cm and dupty cm
विकास की अवधारणा बुलेट ट्रेन से फलीभूत नहीं होगी। हम खेती, उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं। बुनकरी खत्म होने के कगार पर है। यदि महंत आदित्यनाथ की सरकार पूर्वांचल के विकास के लिए टास्क फोर्स बनाए। उसके द्वारा चिह्नित विशिष्ट समस्याओं पर मंत्रियों का समूह (जीओएम) योजनाएं बनाकर समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए सतत निगरानी करे। यहां शिक्षा का स्तर गिर गया है। कृषि उत्पादों की मार्केटिंग की व्यवस्था नहीं है। वाराणसी के ही 90 फीसदी इलाके में सफाई की व्यवस्था नहीं है।  
- प्रो. एमपी सिंह, पूर्व प्रमुख, विधि संकाय, बीएचयू

पूर्वांचल के हालात पर तत्कालीन सांसद विश्वनाथ गहमरी के संसद में शब्दों के जरिए जाहिर की गई बेबसी आज भी वैसी की वैसी ही है। पूर्वांचल के लोगों ने केवल बदलाव के लिए नहीं, विकास के लिए वोट दिया है। रोजगार के अवसरों और सुविधाओं की कमी के कारण पूर्वांचल की स्थिति आज भी कभी ‘बीमारू’ कहे जाने वाले राज्यों जैसी है। वाराणसी की ही बात करें तो यहां बीते 10-12 साल से लगातार खुदाई चल रही है। लग रहा है कि सारे के सारे सरकारी विभाग भगवान शंकर के त्रिशूल को खोजने में लगे हैं।
- आरपी सिंह, राजनीतिशास्त्र विभाग, बीएचयू

पूर्वांचल के विश्वविद्यालयों की उच्च शिक्षित तमाम प्रतिभाएं रोजगार के अवसर कम होने के चलते मुंबई-पुणे से लेकर बंगलूरू पलायन कर जाते हैं। अगर यहां आधारभूत ढांचा मुहैया कराया जाए तो यहां के इंजीनियर और अधिकारी यहीं पर अपनी सेवा देंगे। उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए नीति जब तक बने, तब तक सरकारी उपक्रमों, व्यवस्था को सुविधाएं देकर बेरोजगारी को खत्म करने के लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं। हमारे यहां कच्चा माल और ऊर्जा इतनी प्रचुर मात्रा में हैं, जिससे लागत को कम किया जा सकता है।
 - प्रो. आलोक राय, इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, बीएचयू 

पूरे अंचल की तरक्की के लिए वाराणसी के पर्यटन और तीर्थाटन के लिए ढांचागत सहूलियतें उपलब्ध कराने की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत यहां ‘विधि का शासन-पारदर्शी प्रशासन’ की है। पूर्वांचल के कृषि कार्य में लगे लोगों को उद्योगों जैसी सुविधाएं दी जाएं। इसके अलावा यहां राष्ट्रीय महत्व की नई संस्थाएं खोलने के बजाय मौजूदा संस्थाओं को ही यह दर्जा दिया जाए। काशी विद्यापीठ, पूर्वांचल और संपूर्णानंद को भी बीएचयू जैसी मान्यता देकर यहां के विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
- प्रो. रवि प्रकाश पांडेय, पूर्व विभागाध्यक्ष, समाज शास्त्र, काशी विद्यापीठ 
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