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जल पूरित प्यालों पर छलके नेह के राग

Mon, 13 Apr 2015 02:03 AM IST
वाराण्ासी, ब्यूरो
वाराण्ासी, ब्यूरो Updated Mon, 13 Apr 2015 02:03 AM IST
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Sonal man singh dancing in Sankat mochan sangit smaroh

वाराणसी। जल से भरे प्याले सजे और उन पर राग-माधुर्य की अवतारणा हुई। रविवार की रात श्रोताओं की भीड़ स खचाखच भरे संकट मोचन में लुप्त होने के कगार पर पहुंचे लुप्त हो रहे वाद्य जलतरंग पर डॉ.राजेश्वर आचार्य ने अलाप, जोड़ के बाद गतकारी से फिजा बदल दी। बनारस घराने के यशस्वी गायक राजन-साजन मिश्र की सधी गायकी के दौरान बूंदे टपकने लगीं लेकिन श्रोता टस से मस नहीं हुए। ओडिसी नृत्यांगना सोनल मानसिंह रामचरित मानस के कई प्रसंगों को जीवंत किया।

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संकट मोचन संगीत समारोह की पांचवीं निशा दिग्गज कलाकारों के नाम रही। शुरुआत हुई दिल्ली की सोनल मानसिंह के ओडिसी नृत्य से। पहले उन्होंने काशीपति बाबा विश्वनाथ की नृत्यमय स्तुति की। इसके बाद स्वर शब्द पर भावों को जब उन्होंने नृत्य में बांधा तब जयकारे गूंजने लगे।
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 हनुमानाष्टक के बाद सीता स्वयंवर और लक्ष्मण शक्ति के प्रसंगों पर उनकी थिरकन का जादू चला। इनके साथ सरोद पर अबरार हुसैन, पखावज पर प्रशांत कुमार मंगाराज, बांसुरी पर विनय प्रसन्ना ने संगत की। इनके बाद जलतरंग के प्याले सजने लगे। इस वाद्य को सुनने के लिए श्रोताओं ने पहले से जगह ले ली थी।
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डॉ.राजेश्वर आचार्य ने मंच संभालते ही चुटकी ली कि प्याले किससे भरे हैं, चाहें तो बजने से पहले जांच-परख करवा सकते हैं। इस पर ठहाके लगने लगे। उन्होंने जल तरंग पर राग कलावती की अवतारणा की। अलाप, जोड़ के बाद उन्होंने मध्यलय और द्रुत लय में गतकारी पेश की। इसके बाद पं. किशन महाराज को जब पद्मश्री मिला था, तब जिस पीयूष राग की उन्होंने रचना की थी, उसकी भी जलतरंग पर अतारणा की।
तबले पर संगत की नंद किशोर मिश्र ने। इनके बाद गायन था अनूप मिश्र का लेकिन प्रस्तुति में बदलाव करते हुए पं. राजन-साजन मिश्र को मंच सुपुर्द कर दिया गया। मिश्र बंधुओं ने राग नायिकी कान्हड़ा में अलापचारी की। विलंबित एक ताल में निबद्ध रचना के बोल थे ‘छैल छबीला रंगीला वनरा मोरा प्यारा...।’

 गमक के साथ तान का अनूठा प्रयोग संगीत प्रेमियों को मुग्ध करता रहा। इसके बाद उन्होंने इसी राग में द्रुत तीन ताल में बंदिश ‘पखेरूआ बोले माई जंगल...’ प्रस्तुत की। राग अड़ाना में एक बंदिश के बाद राग किरवानी में बंदिश ‘दरश दिखाओ सुंदर श्याम..’ को सुर से सजाया। अंत में भजन पेश कर विदा ली। तबले पर पं. कुमार बोस, हारमोनियम पर धर्मनाथ मिश्र ने संगत की।  संचालन हरिराम द्विवेदी ने किया।

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