वाराणसी में एक ऐसा सरकारी स्कूल, जिसे देख भूल जाएंगे प्राइवेट स्कूल
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परिषदीय स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया अब बदलने लगा है। वाराणसी जिले में कुछ ऐसे परिषदीय स्कूल है जो अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं। कुछ बच्चे अंग्रेजी स्कूलों से नाम कटवाकर इसमें प्रवेश तक ले चुके हैं। इन्हीं में से एक है सेवापुरी ब्लॉक का प्राथमिक विद्यालय जोगियापुर। यहां शिक्षकों ने स्कूल के कक्षों को पब्लिक स्कूलों की भांति सजा रखा है। बच्चों को भी आधुनिक संसाधनों से शिक्षा दी जा रही है।
इंचार्ज प्रधानाध्यापक सुप्रिया तिवारी बताती हैं 2018 तक स्कूल की पहचान गिरती दीवारें, टूटी फर्ज, नाम मात्र के बच्चे व शिक्षकों की कमी से थी। लेकिन आज उनकी पहचान चमचमाती फर्श, दीवारों पर शानदार पेंटिंग, अत्याधुनिक लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, कंप्यूटर लैब, साफ-सुथरे शौचालय और ढेर सारे बच्चों से है।
स्मार्ट क्लास में प्रोजेक्टर से पढ़ाई
बच्चों को पारंपरिक शिक्षा से हटकर डिजिटल शिक्षा देने के लिए शिक्षकों ने अपने खर्च से विद्यालय में प्रोजेक्टर की व्यवस्था की जिसमें बच्चे ऑडियो वीडियो के माध्यम से पढ़ाई करते हैं। वही लूडो के जरिए बच्चों को खेल-खेल में गिनती, जोड़- घटाना सिखाया जाता है।
अत्याधुनिक सुविधाएं
विद्यालय की हर कक्षा में टाइल्स, डेस्क बेंच, वाइट बोर्ड, बाला पेंटिंग, पुस्तकालय, मल्टीपल हैंडवाश, टाइल्स लगा रसोई घर, डायनिंग हॉल, आदर्श शौचालय के साथ बच्चों को खेलने के लिए झूला, खेल सामग्री व खेल मैदान भी उपलब्ध है।
लेसन प्लान और रोचक गतिविधियां
बच्चों को पढ़ाने के लिए हम सभी शिक्षक स्कूल की छुट्टी होने के बाद अगले दिन की तैयारी पहले से कर लेते है। इसके लिए बकायदे लेसन प्लान तैयार किया जाता है। जिसके अनुसार दूसरे दिन पढ़ाई होती है। इसके अलावा बच्चों के लिए अन्य रोचक गतिविधियां जैसे आर्ट एंड क्राफ्ट, कहानी सुनाओ प्रतियोगिता, विशेष दिवस पर आधारित कार्यक्रम व मीना मंच के तहत कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
ऐसे हुई बदलाव की शुरुआत
विद्यालय की इंचार्ज प्रधानाध्यापक सुप्रिया बताती हैं कि 2018 तक विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं था। 2018 में अंतर्जनपदीय स्थांतरण में दो शिक्षिकाएं आईं। जिसके बाद पढ़ाई के स्तर में सुधार होना शुरू हुआ।
विद्यालय में कभी 100 बच्चे भी नहीं थे। 2018 में 68000 शिक्षक भर्ती के तहत 2 शिक्षक और आए जिससे विद्यालय में अध्यापकों की कमी पूरी हो गई। जिसके बाद शिक्षकों के साथ मिलकर मैंने सबसे पहले स्कूल में नामांकन बढ़ाने के लिए गांव में कैंपेन चलाया। जिसके बाद गांव में विद्यालय की छवि सुधरी और लोगों ने अपने बच्चों का प्रवेश कराया। जिसकी बदौलत आज वर्तमान में 150 बच्चे विद्यालय में पढ़ाई करते हैं।
सुप्रिया बताती है शुरू में जब मैं यहां आयी तो विद्यालय में बाउंडरी वॉल नहीं था। जिसके लिए हमने ग्राम प्रधान से संपर्क किया और उन्होंने ग्राम सभा के पैसों से विद्यालय की बाउंड्री वॉल बनवा दी। जिसके बाद हमने विद्यालय में हरियाली के लिए पौधे लगाएं। शिक्षकों ने अपने वेतन के साथ-साथ कंपोजिट ग्रांट से विद्यालय की सूरत ऐसी बदली है कि आज वह अपने जिले के साथ-साथ अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा सोत्र बन गया है।