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फॉर्मूला एक-रेट अनेक: ब्रांड के फेर में 10 गुना तक खाली हो रही मरीजों की जेब, 10 की दवा 90 में बिक रही

Tue, 27 Oct 2026 01:28 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Tue, 27 Oct 2026 01:28 PM IST
सार

एक ही फॉर्मूले की दवाओं की कीमतों में बड़ा अंतर मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है। दवा केंद्र पर 10 रुपये में मिलने वाली दवा मेडिकल स्टोर पर 90 रुपये तक में बिक रही है। ब्रांड के नाम पर कीमतों में दस गुना तक का अंतर सामने आ रहा है, जिससे मरीजों का इलाज महंगा हो रहा है।

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One formula many price points Brand-name markups draining patients pockets medicine 10 rupees sold 90 medicine
दवाइयां। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वाराणसी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के बीच दवाओं की कीमतों का भारी अंतर मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है। एक ही सॉल्ट और फॉर्मूले की दवाएं बाजार में अलग-अलग अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर बेची जा रही हैं। निजी मेडिकल स्टोर्स पर बिकने वाली ब्रांडेड दवाओं की कीमतें सरकारी जन औषधि केंद्रों की तुलना में 6 से 10 गुना तक अधिक हैं।

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पेट दर्द, गैस (एसिडिटी), एंटीबायोटिक, मल्टीविटामिन, दर्द निवारक और कफ सिरप जैसी रोजमर्रा की दवाओं में सबसे ज्यादा मुनाफाखोरी देखी जा रही है। उदाहरण के तौर पर, गैस और एसिडिटी के इलाज में काम आने वाली ओमेप्राजोल व डोमपेरिडोन का 10 कैप्सूल का पत्ता प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र पर मात्र 17-20 रुपये में उपलब्ध है, जबकि निजी दुकानों पर नामी ब्रांड्स के तहत यही फॉर्मूला 100 से 180 रुपये तक में बिक रहा है।

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जेब पर पड़ा भारी असर

इसी तरह बुखार और बदन दर्द की सामान्य दवा एसिक्लोफेनेक व पैरासिटामोल (325 मिग्रा) जन औषधि केंद्र पर 10 रुपये से भी कम में 10 गोलियां मिल जाती हैं, जबकि निजी मेडिकल स्टोर पर विभिन्न कंपनियों के ब्रांडेड पत्ते 60 - 90 रुपये तक बिकते हैं। एंटीबायोटिक दवाओं (जैसे एजिथ्रोमाइसिन या सेफिक्सिम) में यह अंतर 100 - 150 रुपये तक पहुंच जाता है।

130 जन औषधि केंद्रों पर मिलती हैं सस्ती दवाएं: मरीजों को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के लिए शासन ने जिले में 130 से अधिक जन औषधि केंद्र खोले हैं। प्रधानमंत्री जनऔषधि एसोसिएशन के उपाध्यक्ष प्रवीण मौर्य बताते हैं कि जमीनी स्तर पर डॉक्टरों द्वारा पर्चे पर सॉल्ट (जेनेरिक नाम) की जगह सीधे कंपनियों के महंगे ब्रांड का नाम लिखने और आमजन में जेनेरिक दवाओं के प्रति जागरूकता की कमी के कारण मरीज मेडिकल स्टोर्स से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। यदि चिकित्सक जेनेरिक नाम लिखें और जन औषधि केंद्रों के माध्यम से मरीजों के इलाज का खर्च 60 से 70 फीसदी तक घट सकता है।

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दवाओं की कीमतों में भारी अंतर

  • दवाओं का काम - दवा का नाम - सरकारी रेट - ब्रांडेड कंपनियों के रेट
  • दर्द बुखार की दवा - एसिक्लोफेनेक व पैरासिटामोल - 9.38 - 60 से 90
  • गले के इंफेक्शन में काम आने वाली एंटीबायोटिक - एजिथ्रोमाइसिन - 22 - 90 से 140
  • एसिडिटी - ओमेप्राजोल व डोमपेरिडोन - 17 - 70 से 120
  • हड्डियों को मजबूत करने की दवा - कैल्शियम - 30 - 150 से 250
  • कफ सिरप - एंब्राक्सॉल - 30 - 90 से 120
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दवाओं से जुड़े मामले पर निगरानी की जिम्मेदारी खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की है। विभाग के ओर से जो भी सहयोग औषधि प्रशासन के ओर से मांगा जाएगा, वह किया जाएगा। मरीजों और तीमारदारों से भी अपील है कि वे जागरूकता दिखाएं और जन औषधि केंद्रों का लाभ उठाएं। - डॉ. एनपी सिंह, सीएमओ।

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